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07-Oct-2025 07:23 AM
By First Bihar
Bihar Assembly Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की मतगणना 14 नवंबर को तय की गई है। वहीं, दिन जब भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्मदिन होता है। चुनाव आयोग ने यह तारीख प्रशासनिक कारणों से तय करने की बात कही है, लेकिन राजनीति के मैदान में इस तारीख को लेकर नए समीकरण और चर्चाएं तेज हैं। सवाल उठ रहा है कि आखिर इलेक्शन कमीशन की क्या मंशा रही होगी? क्या यह तारीख सिर्फ एक तकनीकी संयोग है या इसके पीछे कोई गहरा राजनीतिक संदेश छिपा है?
सबसे पहले तकनीकी और संवैधानिक दृष्टि से देखें तो बिहार विधानसभा का कार्यकाल 22 नवंबर 2025 को पूरा हो रहा है। चुनाव आयोग को नई विधानसभा गठित करने के लिए उससे पहले परिणाम घोषित करने होते हैं। मतदान 6 और 9 नवंबर को दो चरणों में पूरा होना है, ऐसे में मतगणना के लिए 14 नवंबर की तारीख पूरी तरह तार्किक लगती है। चुनाव आयोग के पास ईवीएम की सुरक्षा, मतपेटियों की निगरानी, स्टाफ की तैनाती और परिणाम तैयार करने की प्रक्रिया में कम से कम चार से पांच दिनों का अंतराल रखना अनिवार्य होता है। इसलिए प्रशासनिक रूप से यह तारीख स्वाभाविक है।
लेकिन राजनीति में हर तारीख, हर निर्णय को प्रतीक के रूप में देखा जाता है। 14 नवंबर नेहरू जयंती कांग्रेस की ऐतिहासिक पहचान से जुड़ा दिन है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि इस तारीख ने सियासी गलियारों में हलचल जरूर मचा दी है।
पंडित जवाहर लाल नेहरू भारतीय लोकतंत्र के स्थापत्यकार माने जाते हैं। उन्होंने स्वतंत्र भारत को लोकतांत्रिक, समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष आधार पर खड़ा किया। नेहरू के जन्मदिन पर वोटों की गिनती होना, एक तरह से भारत की लोकतांत्रिक यात्रा को सलाम करने जैसा है। कांग्रेस के लिए यह दिन हमेशा भावनात्मक रहा है, वहीं विपक्ष के लिए यह अवसर एक राजनीतिक प्रतीक में बदल सकता है।
कांग्रेस और महागठबंधन इस दिन को “लोकतंत्र की पुनर्पुष्टि” के रूप में प्रचारित कर सकते हैं। वहीं भाजपा के लिए यह दिन “संयोग” कहा जाएगा—एक ऐसा दिन जब जनता अपने मत से तय करेगी कि विकास की दिशा कौन तय करेगा। लेकिन प्रतीकवाद की राजनीति में तारीखें भी हथियार बन जाती हैं, और यही कारण है कि चुनाव आयोग का यह फैसला सियासी बहसों का केंद्र बना हुआ है।
कई राजनीतिक विश्लेषक यह भी याद दिला रहे हैं कि 8 नवंबर, जो भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का जन्मदिन है, कई बार पार्टी के लिए शुभ रहा है। वर्ष 2015 के बिहार चुनाव में हालांकि ऐसा नहीं हुआ था, पर 2014 के लोकसभा चुनाव में 8 नवंबर के आसपास भाजपा ने जबरदस्त रफ्तार पकड़ी थी। इस बार भी कुछ लोग कह रहे हैं कि भाजपा नेहरू जयंती के दिन “ऐतिहासिक जीत” दर्ज कर कांग्रेस को प्रतीकात्मक संदेश दे सकती है यानी, “नेहरू के दिन भाजपा की विजय।”
अब बात करें बिहार के मौजूदा समीकरणों की। 243 सीटों वाली विधानसभा में जीत का आंकड़ा 122 है। हालिया सर्वेक्षणों के मुताबिक एनडीए गठबंधन (भाजपा, जदयू और सहयोगी दल) को 130–150 सीटों तक मिलने की संभावना जताई जा रही है। महागठबंधन (राजद, कांग्रेस, वामदल आदि) को 85-105 सीटों तक मिल सकती हैं। अन्य दल या निर्दलीय उम्मीदवार 10-15 सीटों पर प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं।
भाजपा इस बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ “स्थिरता और विकास” के मुद्दे पर चुनाव मैदान में है। महागठबंधन बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था को बड़ा मुद्दा बना रहा है। तेजस्वी यादव अपने अभियान में “नौजवान और बदलाव” की राजनीति पर जोर दे रहे हैं, जबकि भाजपा “डबल इंजन की सरकार” और केंद्र से समन्वय की बात कह रही है।
बिहार की राजनीति हमेशा जातीय समीकरणों से प्रभावित रही है। यादव, मुसलमान, कुर्मी, कोइरी और दलित मतदाता समूह इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। एनडीए को सवर्णों और पिछड़ों के एक बड़े वर्ग का समर्थन मिलने की उम्मीद है, जबकि महागठबंधन अपनी परंपरागत यादव-मुस्लिम आधार को मजबूत करने में जुटा है। कांग्रेस इस बार सीमांचल और शहरी इलाकों में पुनर्जीवन की कोशिश कर रही है।
चुनाव आयोग की तारीखें आमतौर पर तकनीकी कारणों से तय होती हैं, लेकिन जब वह किसी ऐतिहासिक या भावनात्मक दिन से टकरा जाए, तो राजनीति में उसकी व्याख्या अलग दिशा ले लेती है। 14 नवंबर सिर्फ एक तारीख नहीं रह गई है यह अब “नेहरू बनाम नई राजनीति” का प्रतीक बन चुकी है।
जहाँ एक ओर भाजपा इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का उत्सव कहेगी, वहीं महागठबंधन इसे नेहरू की विरासत की पुनर्स्थापना के रूप में पेश करेगा। जनता के लिए यह बस एक दिन है जब वोटों की गिनती होगी, लेकिन सियासत के लिए यह एक बड़ा प्रतीक “नेहरू के दिन बिहार का फैसला”।
तो क्या चुनाव आयोग ने जानबूझकर 14 नवंबर चुनी? शायद नहीं। क्या यह तारीख प्रतीकात्मक रूप से नई राजनीति और पुरानी विरासत के टकराव को दिखाती है? जब मतगणना शुरू होगी, नेहरू के नाम पर बाल दिवस मनाने वाले स्कूलों में बच्चे खेल रहे होंगे, और बिहार की सियासी जमीन पर नेताओं की किस्मतें खुल या बंद हो रही होंगी। इतिहास के इस दिलचस्प मोड़ पर यह कहना गलत नहीं होगा कि 14 नवंबर 2025 को न सिर्फ वोटों की गिनती होगी, बल्कि विचारों की भी परीक्षा होगी नेहरू के भारत और आज के भारत के बीच।