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09-Oct-2025 07:18 AM
By First Bihar
Bihar News: बिहार में राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) पर बनने वाले बाइपास परियोजनाओं पर अब संकट के बादल मंडराने लगे हैं। केंद्र सरकार ने बाइपास निर्माण के लिए नई शर्तें लागू करते हुए बिहार सरकार से जमीन अधिग्रहण की आधी कीमत (50%) वहन करने की मांग की है। अगर राज्य सरकार इस राशि का भुगतान नहीं करती है, तो केंद्र ने दूसरा विकल्प देते हुए कहा है कि राज्य सरकार 25% जमीन की कीमत चुकाए और साथ ही एसजीएसटी में छूट (SGST Exemption) प्रदान करे।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) की इस नई शर्त से राज्य में प्रस्तावित कई बाइपास परियोजनाओं पर ग्रहण लग सकता है। दरअसल, बिहार के पथ निर्माण विभाग ने हाल ही में अरवल, दाउदनगर और औरंगाबाद बाइपास निर्माण का प्रस्ताव केंद्र को भेजा था। मंत्रालय ने इनमें से केवल अरवल और दाउदनगर बाइपास को मंजूरी दी, जबकि औरंगाबाद बाइपास को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उस क्षेत्र में जमीन की न्यूनतम दर बहुत अधिक है, जिससे अधिग्रहण लागत बढ़ जाएगी।
मंजूर दो परियोजनाओं में अरवल बाइपास पर 665.50 करोड़ रुपये और दाउदनगर बाइपास पर 288.28 करोड़ रुपये खर्च होंगे। ये दोनों बाइपास एनएच-139 पर बनाए जा रहे हैं, जो पटना को औरंगाबाद और आगे झारखंड से जोड़ता है। इन बाइपासों के बनने से पटना, अरवल, दाउदनगर और आसपास के इलाकों के बीच सड़क संपर्क काफी बेहतर होगा और यातायात दबाव में भी कमी आएगी।
मंत्रालय ने मंजूरी के क्रम में ही बिहार सरकार को जुलाई 2025 में भेजे गए पत्र का हवाला देते हुए नई वित्तीय शर्तें जोड़ी हैं। अधिकारियों का कहना है कि अब तक केवल पटना रिंग रोड परियोजना के लिए ही राज्य सरकार ने जमीन अधिग्रहण में आर्थिक सहयोग देने पर सहमति दी थी, लेकिन अब केंद्र सरकार सभी परियोजनाओं के लिए राज्य की हिस्सेदारी चाह रही है।
बिहार सरकार के अधिकारियों का तर्क है कि राष्ट्रीय राजमार्गों की जिम्मेदारी पूरी तरह केंद्र सरकार की होती है, क्योंकि एनएच के निर्माण, रखरखाव और टोल टैक्स की वसूली का अधिकार केंद्र के पास है। ऐसे में बिहार सरकार से जमीन की कीमत वसूलना अनुचित है।
राज्य सरकार के अनुसार, अन्य राज्यों में जब राज्य की सड़कों को एनएच में बदला जाता है, तो केंद्र सरकार ही राज्य को जमीन की कीमत चुकाती है, जबकि बिहार ने कभी भी अपनी सड़कों (स्टेट हाईवे और एमडीआर) को एनएच में बदलने के दौरान केंद्र से कोई आर्थिक सहायता नहीं मांगी है। राज्य के अधिकारियों का मानना है कि अगर यह नीति लागू होती है, तो बिहार जैसे सीमित संसाधन वाले राज्य के लिए 120 प्रस्तावित बाइपास परियोजनाओं को पूरा करना लगभग असंभव हो जाएगा।
बिहार सरकार ने राज्य में 120 बाइपास बनाने का निर्णय लिया है ताकि यातायात का दबाव कम हो और जिला मुख्यालयों के बीच आवागमन सुगम हो सके। इनमें अब तक 14 बाइपास पूरे हो चुके हैं, जबकि 17 पर कार्य चल रहा है। इसके अलावा 9 नए बाइपासों के प्रस्ताव विभिन्न मंजूरी चरणों में हैं। प्रस्तावित बाइपासों में एनएच 327ई पर सुपौल, पिपरा और त्रिवेणीगंज, एनएच 106 पर सिंहेश्वर, एनएच 98 पर अरवल, दाउदनगर और औरंगाबाद, और एनएच 120 पर डुमरांव और दावथ में बाइपास निर्माण की योजना है।
इन बाइपासों के बनने से न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी, बल्कि राज्य के औद्योगिक विकास और लॉजिस्टिक नेटवर्क को भी मजबूत आधार मिलेगा। बिहार सरकार ने संकेत दिया है कि वह केंद्र सरकार से इस शर्त पर पुनर्विचार करने की मांग करेगी। राज्य के पथ निर्माण विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यदि केंद्र अपनी नीति में संशोधन नहीं करता, तो राज्य को कई परियोजनाओं पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। वर्तमान में बिहार में बाइपास निर्माण राज्य की कनेक्टिविटी सुधारने और आर्थिक गतिविधियों को तेज करने की दिशा में अहम भूमिका निभा रहा है। मगर नई शर्तों के कारण यह महत्वाकांक्षी योजना ठहराव का शिकार हो सकती है।