ब्रेकिंग न्यूज़

बैंड-बाजों के साथ अनंत सिंह का स्वागत,जेल से बाहर आने के बाद कहा - अब जनता का काम करेंगे... Bihar Politics : शरद यादव से ललन सिंह तक; अब फिर नीतीश कुमार बने JDU के बॉस, जानिए अब तक कितनी दफा संभाल चुके हैं राष्ट्रीय अध्यक्ष का दायित्व वंदे भारत की चपेट में आने से युवक गंभीर रूप से हुआ घायल, इलाज के दौरान मौत; स्टेशन पर मची अफरातफरी Bihar news : पिघली सियासी दूरी ! चिराग पासवान ने चाचा पशुपति पारस के छुए पैर,तस्वीर वायरल; क्या खत्म होगी नाराजगी? अब इन लोगों को इलाज के लिए नहीं जाना होगा रांची! हर जिले में जल्द शुरू होगा इस बीमारी का इलाज; सरकार ने लिया फैसला Bihar mutation scam : सरकारी जमीन गायब करने का खेल? सुपौल के CO पर FIR, जांच में चौंकाने वाले खुलासे Nitish Kumar : JDU अध्यक्ष रहेंगे CM नीतीश, आज होगी औपचारिक घोषणा; पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह Bihar crime news ; मुजफ्फरपुर में बवाल का VIDEO वायरल! पथराव के बाद 11 पर केस; घर में घुसकर दुष्कर्म की कोशिश का आरोप BIHAR NEWS : शिवहर डीडीसी ब्रजेश कुमार के ठिकानों पर SVU की बड़ी रेड, मोतिहारी-पटना में एक साथ कार्रवाई; आय से अधिक संपत्ति का आरोप Bihar News : “18 लाख महिलाओं के 10-10 हजार अटके! ‘महिला रोजगार योजना’ में फंसा पेच; जानिए क्या है वजह

Home / bihar / bhagalpur-news / Bihar News: नालंदा के बाद बिहार के इस यूनिवर्सिटी के लौटने वाले हैं...

Bihar News: नालंदा के बाद बिहार के इस यूनिवर्सिटी के लौटने वाले हैं दिन, निर्माण के लिए साइट विकसित कर रहा ASI

25-Mar-2025 04:36 PM

By First Bihar

Bihar News: राजगीर की तलहटी में नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना के एक दशक बाद, बिहार के भागलपुर जिले में स्थित प्राचीन विक्रमशिला विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने का कार्य तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) पिछले वर्ष दिसंबर से इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण और विकास का कार्य कर रहा है, जिससे अधिक पर्यटकों को आकर्षित किया जा सके। इसी बीच, बिहार सरकार ने हाल ही में भागलपुर जिले के अंतीचक गांव में केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए 202.14 एकड़ भूमि चिन्हित की है।


लंबे समय से रुकी परियोजना को मिली गति

केंद्र सरकार ने 2015 में इस परियोजना को मंजूरी देते हुए 500 करोड़ रुपये आवंटित किए थे, लेकिन उपयुक्त भूमि की पहचान न हो पाने के कारण इस पर कोई ठोस प्रगति नहीं हो सकी। अब राज्य सरकार की ओर से भूमि चिह्नित किए जाने के बाद परियोजना के मूर्त रूप लेने की संभावना बढ़ गई है।


वहीं, 24 फरवरी को भागलपुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “अपने चरम पर, विक्रमशिला विश्वविद्यालय ज्ञान का वैश्विक केंद्र था। हमने प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के गौरव को नए नालंदा विश्वविद्यालय के माध्यम से पुनर्जीवित किया है। अब बारी विक्रमशिला की है, जहां एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की जा रही है।”


विक्रमशिला महाविहार के संरक्षण का कार्य जारी

सप्ताहांत की एक सुबह, प्राचीन विक्रमशिला महाविहार के खंडहरों पर संरक्षण कार्य तेज़ी से चलता दिखा। श्रमिक स्थल की वनस्पतियों को हटा रहे थे और संरचनाओं को उजागर करने के लिए मिट्टी को सावधानीपूर्वक साफ कर रहे थे। पूरे स्थल को संरक्षण और सुरक्षा प्रक्रिया के तहत ग्रिड में विभाजित किया गया है।


खंडहरों के बीच सबसे प्रमुख संरचना एक क्रूसिफ़ॉर्म (क्रॉस-आकार) ईंट स्तूप है, जो विक्रमशिला का केंद्रबिंदु माना जाता है। इसके चारों ओर 208 छोटे-छोटे कक्ष बने हुए हैं—प्रत्येक ओर 52—जहां विद्यार्थी और भिक्षु अध्ययन करते थे। विक्रमशिला विश्वविद्यालय अपने समय में तंत्रयान बौद्ध धर्म के अध्ययन और अनुसंधान के लिए प्रसिद्ध था। तंत्रयान, जो हीनयान और महायान के बाद भारतीय बौद्ध धर्म की तीसरी प्रमुख शाखा थी, तांत्रिक साधनाओं और गुप्त अनुष्ठानों पर केंद्रित था।


पाल वंश का गौरवशाली शिक्षाकेंद्र

विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना 8वीं-9वीं शताब्दी में पाल वंश के राजा धर्मपाल ने की थी। यह नालंदा विश्वविद्यालय का समकालीन था और पाल काल (8वीं से 12वीं शताब्दी) के दौरान अपनी शैक्षिक श्रेष्ठता के लिए प्रसिद्ध हुआ।


ASI के अधीक्षण पुरातत्वविद् (पटना सर्कल) सुजीत नयन के अनुसार, “जहां नालंदा विश्वविद्यालय गुप्त काल (320-550 ई.) से लेकर 12वीं शताब्दी तक प्रसिद्ध रहा, वहीं विक्रमशिला विश्वविद्यालय पाल काल में अपने उत्कर्ष पर था। नालंदा विविध विषयों के अध्ययन का केंद्र था, जबकि विक्रमशिला विश्वविद्यालय विशेष रूप से तांत्रिक और गुप्त विद्याओं में विशेषज्ञता रखता था। राजा धर्मपाल के शासनकाल के दौरान, विक्रमशिला को नालंदा से भी अधिक महत्व प्राप्त था और यह नालंदा विश्वविद्यालय के प्रशासन को भी नियंत्रित करता था।”


विक्रमशिला के पुनरुद्धार से न केवल बिहार की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को नई पहचान मिलेगी, बल्कि यह शिक्षा और पर्यटन के क्षेत्र में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।