IPAC office ED raid : i-PAC दफ्तर पर ED रेड का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, ममता सरकार पर गंभीर आरोप; SG ने कहा - 'ममता बनर्जी ने पुलिस के साथ मिलकर चुराए सबूत'

कोलकाता में आई-पैक के दफ्तर पर हुई प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की छापेमारी अब एक बड़ा संवैधानिक और राजनीतिक मुद्दा बन गई है। इस मामले में ईडी ने पश्चिम बंगाल सरकार और पुलिस अधिकारियों पर जांच में बाधा डालने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।

1st Bihar Published by: First Bihar Updated Thu, 15 Jan 2026 12:18:27 PM IST

IPAC office ED raid :  i-PAC दफ्तर पर ED रेड का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, ममता सरकार पर गंभीर आरोप; SG ने कहा - 'ममता बनर्जी ने पुलिस के साथ मिलकर चुराए सबूत'

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IPAC office ED raid : पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में चुनावी रणनीतिकार संस्था आई-पैक (I-PAC) के दफ्तर पर हुई प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की छापेमारी अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गई है। इस मामले में ईडी ने पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों पर जांच में बाधा डालने और सबूतों से छेड़छाड़ करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। ईडी ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, जिस पर सुनवाई जारी है।


सुप्रीम कोर्ट में ईडी की ओर से सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने पक्ष रखते हुए दावा किया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य पुलिस अधिकारियों के साथ मिलकर जांच एजेंसी के कामकाज में सीधा हस्तक्षेप किया। उन्होंने अदालत को बताया कि छापेमारी के दौरान न केवल जांच प्रक्रिया को बाधित किया गया, बल्कि महत्वपूर्ण साक्ष्यों की कथित रूप से “चोरी” भी की गई।


ईडी का आरोप है कि जब एजेंसी के अधिकारी आई-पैक के कोलकाता स्थित दफ्तर में छानबीन कर रहे थे, उसी दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं मौके पर पहुंच गईं। एजेंसी का दावा है कि मुख्यमंत्री की मौजूदगी में राज्य पुलिस के कुछ अधिकारियों ने ईडी अधिकारियों से उनके लैपटॉप, मोबाइल फोन और जरूरी दस्तावेज जबरन छीन लिए। ईडी के अनुसार, ये सभी उपकरण और कागजात जांच के लिहाज से बेहद अहम थे और इनमें डिजिटल साक्ष्य भी शामिल थे।


ईडी ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि पश्चिम बंगाल के डीजीपी राजीव कुमार और कोलकाता पुलिस कमिश्नर मनोज कुमार वर्मा को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए। साथ ही, एजेंसी ने इन दोनों वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का भी अनुरोध किया है। ईडी का कहना है कि अगर जांच एजेंसियों के काम में इस तरह का हस्तक्षेप बर्दाश्त किया गया, तो कानून के राज और संघीय ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े होंगे।


सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में दलील दी कि यह कोई एकल घटना नहीं है, बल्कि पश्चिम बंगाल में केंद्रीय एजेंसियों के खिलाफ राज्य मशीनरी के इस्तेमाल का एक “पैटर्न” बन चुका है। उन्होंने कहा कि जब भी किसी केंद्रीय एजेंसी द्वारा राज्य में जांच की जाती है, तो स्थानीय प्रशासन और पुलिस की ओर से उसे बाधित करने की कोशिश की जाती है। इससे न केवल जांच प्रभावित होती है, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर भी आघात पहुंचता है।


वहीं, इस पूरे मामले को लेकर राजनीतिक हलकों में भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। विपक्षी दलों ने ममता बनर्जी सरकार पर केंद्रीय एजेंसियों को डराने और जांच से बचने का आरोप लगाया है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि ईडी और अन्य केंद्रीय एजेंसियां केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रही हैं और राज्य सरकार को बदनाम करने के लिए कार्रवाई कर रही हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सभी पक्षों की दलीलें सुनी हैं। अदालत अब यह समीक्षा कर रही है कि क्या जांच एजेंसी के काम में अवैध रूप से हस्तक्षेप किया गया और क्या राज्य सरकार तथा पुलिस अधिकारियों की भूमिका संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप थी। कोर्ट यह भी देख रही है कि इस पूरे घटनाक्रम से कानून-व्यवस्था और संघीय ढांचे पर क्या प्रभाव पड़ा है।


फिलहाल, देश की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अगले आदेश पर टिकी हैं। इस मामले में आने वाला फैसला न केवल ईडी और पश्चिम बंगाल सरकार के लिए अहम होगा, बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के संतुलन को लेकर भी एक महत्वपूर्ण नजीर साबित हो सकता है।