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परमात्म प्रेम मतलब नकारात्मकता से सकारात्मकता तक की यात्रा, जीवन में चुनेंगे शांति का मार्ग

जीवन में कई बार हम भय, आशंका और अनिश्चितता के दौर से गुजरते हैं। ऐसे क्षणों में मन विचलित हो उठता है, और यह सवाल सताने लगता है कि भविष्य कैसा होगा।

Divine love

27-Jan-2025 07:16 AM

By First Bihar

जब जीवन में भय का अनुभव हो, यह सोचकर मन विचलित हो जाए कि कल क्या होगा, तब इससे निपटने का एकमात्र उपाय है—परमात्म प्रेम। यह प्रेम न केवल हमें भयमुक्त करता है, बल्कि ज्ञान और योग से मन की वृत्ति व वातावरण को सकारात्मक और आशावादी भी बनाता है।


संकल्प की शक्ति

हमें यह संकल्प लेना होगा कि वातावरण को शांतिपूर्ण और आनंदमय बनाने की जिम्मेदारी हमारी है। जब हमारा मन बदलेगा, तो संसार भी बदलेगा। हर परिस्थिति में विजय का ध्वज लहराने का विश्वास हमें भीतर से प्रेरित करता है।


मन का नृत्य: प्रसन्नता का रहस्य

प्रसन्नता हमारे मन का नृत्य है। जब हम ईश्वर के प्रेम और दया को अपने जीवन में स्थान देते हैं, तो जीवन सरल और मधुर हो जाता है। ईश्वर, जो हमारे भाग्य विधाता हैं, हमें भी यह प्रेरणा देते हैं कि हम अपने संपर्क में आने वाले सभी व्यक्तियों को कुछ न कुछ उपहार दें—प्रसन्नता का उपहार। यह ऐसा उपहार है, जो जितना बांटा जाए, उतना बढ़ता है।


ईश्वर के प्रति कृतज्ञता

सुबह आंख खुलते ही ईश्वर को धन्यवाद देना और रात्रि में उनका आभार व्यक्त करना, यह आदत जीवन को शुभ और सफल बनाती है। ईश्वर का स्मरण हमें कमल के फूल जैसा बनाता है—अंतर्मुखी और शांत। कमल पुष्प जल और पंक में रहकर भी उनसे अप्रभावित रहता है। ठीक वैसे ही हमें अपने मन और बुद्धि को परमात्मा के साथ जोड़े रखना है। जब हम ज्ञान-सूर्य परमात्मा के साथ योगयुक्त होते हैं, तो हमारे जीवन की पंखुड़ियां प्रसन्नता से खिल उठती हैं।


शुभचिंतन और सहयोग की भावना

हमें जीवन में सदा शुभचिंतक बनना चाहिए। दूसरों की कमियों को देखकर आलोचना के बजाय उन्हें सहयोग देना चाहिए। किसी की कमजोरी या त्रुटि देखकर घृणा नहीं करनी चाहिए, बल्कि उन्हें सहारा देना चाहिए। शुभचिंतन से शुभ वृत्ति और शुभ वातावरण बनता है।


परिवर्तन की पहल: 'पहले मैं' का दृष्टिकोण

विश्व को सकारात्मक दिशा में ले जाने के लिए स्व-परिवर्तन आवश्यक है। हमें नकारात्मकता को सकारात्मकता में बदलने की पहल खुद से करनी होगी। "पहले आप" के बजाय "पहले मैं" का दृष्टिकोण अपनाना होगा। केवल जीव जगत ही नहीं, जड़ जगत यानी प्रकृति भी स्वच्छ, स्वस्थ और शुभ वातावरण की प्रतीक्षा कर रही है।


परमात्म प्रेम: जीवन की दिशा और दृष्टि

परमात्म प्रेम जीवन को गहराई से समझने और जीने की शक्ति देता है। यह हमें सिखाता है कि प्रसन्न रहना और प्रसन्नता बांटना जीवन का मूल उद्देश्य है। मनुष्य के जीवन में सकारात्मकता, सहयोग, और शुभचिंतन का मार्ग अपनाकर हम अपने और संसार के जीवन को सार्थक बना सकते हैं। अपने जीवन को परमात्मा के प्यार से भरकर, हर दिन को आनंदमय और सार्थक बनाएं।