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Bihar Cabinet 2025: लालू के करीबी रामकृपाल कैसे बनें नीतीश के भरोसेमंद, पहली बार मिली बिहार कैबिनेट में जगह?

Bihar Cabinet 2025: बिहार की राजनीति में उतार–चढ़ाव का इतिहास जितना पुराना है, उतनी ही दिलचस्प है उन नेताओं की यात्रा, जिन्होंने इस राजनीतिक धरातल पर कई रूपों में खुद को साबित किया है। ऐसे नेताओं में सबसे प्रमुख नाम है, राम कृपाल यादव।

20-Nov-2025 02:01 PM

By First Bihar

Bihar Cabinet 2025: बिहार की राजनीति में उतार–चढ़ाव का इतिहास जितना पुराना है, उतनी ही दिलचस्प है उन नेताओं की यात्रा, जिन्होंने इस राजनीतिक धरातल पर कई रूपों में खुद को साबित किया है। ऐसे नेताओं में सबसे प्रमुख नाम है, राम कृपाल यादव। वह नेता जिसने वफादारी, बगावत और सत्ता, तीनों के रंग करीब से देखे हैं। कभी लालू प्रसाद यादव के सबसे भरोसेमंद सिपाही माने जाने वाले राम कृपाल तीन दशकों तक राजद की राजनीति के केंद्र में रहे। संगठन, रणनीति और चुनावी फैसलों तक, हर महत्वपूर्ण मोड़ पर उनका योगदान अहम माना जाता था।


12 अक्टूबर 1957 को जन्मे राम कृपाल यादव ने राजनीति की शुरुआत स्थानीय स्तर से की। पटना के मेयर बनने के बाद वे जमीनी नेता के रूप में स्थापित हुए। आगे चलकर वे लालू प्रसाद यादव के सबसे करीबी नेताओं की सूची में शामिल हो गए—ऐसे नेता, जिन पर संगठनात्मक जिम्मेदारियों से लेकर चुनावी प्रबंधन तक हर मोर्चे पर लालू को पूरा भरोसा था।


राजद के टिकट पर वह लगातार तीन बार लोकसभा सांसद चुने गए। लंबे समय तक माना जाता रहा कि राजद की राजनीतिक रणनीति में लालू के बाद जिस नेता का दिमाग सबसे ज्यादा चलता है, वह राम कृपाल हैं। 2014 में सब बदल गया। राजद के भीतर बढ़ती खींचतान, टिकट बंटवारे को लेकर विवाद और नेतृत्व से लगातार असहमति ने आखिरकार उन्हें पार्टी से अलग होने पर मजबूर कर दिया।


यह कदम न सिर्फ बिहार की राजनीति में बड़ा परिवर्तन था, बल्कि राम कृपाल यादव की नई राजनीतिक पहचान की शुरुआत भी थी। भाजपा ने उन्हें पाटलिपुत्र सीट से प्रत्याशी बनाया, जहां मुकाबला था लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा भारती से। राम कृपाल ने मीसा भारती को हराकर भाजपा के लिए यह प्रतिष्ठित सीट जीती। यह सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक अध्याय था।


2014–2019 तक वह केंद्र सरकार में ग्रामीण विकास राज्य मंत्री रहे। इस दौरान उन्होंने ग्रामीण सड़क (PMGSY), आवास योजना, मनरेगा, ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम किया। उनकी पहचान एक संजीदा, शांत और प्रशासनिक रूप से समझदार नेता के रूप में उभरी।


2019 में वह दोबारा सांसद बने और भाजपा में उनका प्रभाव और गहरा हुआ। 2024 के बाद भले ही संसदीय भूमिका पहले जैसी न रही हो, लेकिन राज्य और संगठन की राजनीति में उनका अनुभव और नेटवर्क बेहद अहम माना जाता रहा। राजनीतिक यात्रा का एक और बड़ा पड़ाव आज दर्ज हो गया। एनडीए सरकार के गठन के साथ ही राम कृपाल यादव ने नीतीश सरकार में मंत्री पद की शपथ ली।


यह सिर्फ मंत्री पद नहीं, बल्कि उनकी लंबी, संघर्षपूर्ण और बहुआयामी राजनीतिक यात्रा की एक नई शुरुआत है। भाजपा ने उन्हें मंत्रालय देकर यह संदेश भी दिया है कि बिहार की नई सत्ता संरचना में अनुभवी और जमीनी नेताओं की भूमिका निर्णायक होगी। भाजपा में आने के बाद से वे लगातार राज्य की राजनीति में सक्रिय रहे। विभिन्न यादव बहुल इलाकों में उनकी पकड़ पार्टी के लिए उपयोगी मानी जाती है। एनडीए सरकार में यादव समाज से प्रतिनिधित्व बढ़ाने का यह एक रणनीतिक कदम भी माना जा रहा है। लालू के बेहद करीबी रहे नेता का नीतीश सरकार में मंत्री बनना बिहार की बदलती राजनीतिक तस्वीर का संकेत है।


राम कृपाल यादव का सफर यह दिखाता है कि बिहार की राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं है। सिर्फ मेहनत, संघर्ष और राजनीतिक समझ ही नेता को टिकाऊ बनाती है। लालू के भरोसेमंद सिपाही से लेकर, भाजपा के केंद्रीय चेहरे और अब नीतीश सरकार के मंत्री बनने तक, राम कृपाल यादव का यह सफर बिहार की राजनीति का सबसे दिलचस्प और प्रेरक अध्याय बन चुका है।