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खत्म हो गयी शरद यादव की 5 दशकों की राजनीति, कभी शिष्य रहे लालू ने सियासत के सारे रास्ते बंद कर दिये, फेल हो गये सारे पैंतरे

खत्म हो गयी शरद यादव की 5 दशकों की राजनीति, कभी शिष्य रहे लालू ने सियासत के सारे रास्ते बंद कर दिये, फेल हो गये सारे पैंतरे

12-Mar-2020 08:13 PM

PATNA : पटना में आज राज्यसभा चुनाव के लिए आरजेडी के उम्मीदवारों के नाम का एलान के बाद जब शरद यादव समर्थकों ने लालू यादव पर टिकट बेचने का आरोप लगाना शुरू कर दिया तो कई चीजें साफ हो गयी. कभी शरद यादव के शिष्य रहे लालू प्रसाद यादव ने उनकी सियासत का चैप्टर क्लोज कर दिया है. राज्यसभा चुनाव से पहले अपने पुराने पैंतरों को चल रहे शरद यादव के सारे दांव-पेंच का लालू पर कोई असर नहीं हुआ. दीवार पर लिखी इबारत साफ है, शरद अब सियासत के लिए अप्रांसगिक हो गये हैं.


राज्यसभा जाने के लिए बेचैन थे शरद यादव
दरअसल शरद यादव इस दफे राज्यसभा जाने के लिए बेचैन थे. लोकसभा चुनाव के समय ही उनकी राज्यसभा की सदस्यता खत्म हो गयी थी. पिछले दस महीनों से शरद यादव सियासी तौर पर पैदल थे. दिल्ली के लुटियन जोन में मिला बंगला खाली करन के नोटिस लगातार आ रहे थे. सियासत में जमे रहने के लिए लुटियन जोन के बंगले की अहमियत सियासत करने वाला हर शख्स समझता है. लिहाजा शऱद यादव ने हर वो कोशिश की जिससे वो राज्यसभा पहुंच जायें.


काम नहीं आया शरद का पुराना पैंतरा
सियासत में पांच दशकों से जमे रहने वाले शरद यादव अपनी अहमियत बनाये रखने के लिए कुछ पैंतरे लगातार आजमाते रहे हैं. उनमें से एक था-फूट डालो और राज करो. शरद जब तक जडीयू में थे तब तक नीतीश कुमार के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को प्रश्रय दिया. नीतीश दबाव में आये तो शरद की मांग पूरी हुई और शरद ने नीतीश का विरोध करने वालों को खुद ही पार्टी से बाहर भी कर दिया. 2010 में ललन सिंह का मामला हो या फिर उससे पहले उपेंद्र कुशवाहा का मामला. ऐसे हर मामले में शरद यादव पहले नीतीश के खिलाफ आवाज उठाने वालों का साथ देते दिखे और फिर अपनी बात पूरी करवायी.


पिछले कुछ महीनों से जब शरद यादव आरजेडी के सहयोगी दलों के नेताओं उपेंद्र कुशवाहा, जीतन राम मांझी, मुकेश सहनी के साथ ताबड़तोड़ मीटिंग कर रहे थे तो सियासी जानकार इसके मायने समझ रहे थे. शरद यादव लालू पर दबाव बनाना चाह रहे थे. इरादा साफ था कि दबाव में आकर लालू शरद को राज्यसभा भेज दें.


लेकिन शरद की पॉलिटिक्स को दशकों तक नजदीक से देखने वाले लालू किसी दबाव में नहीं आये. पिछले महीने जब शरद यादव लालू से मिलने रिम्स गये तब भी लालू ने राज्यसभा चुनाव या आने वाले विधानसभा चुनाव पर कोई चर्चा ही नहीं की. लालू ने इधर-उधर की बातें. स्वास्थ्य के बारे में बताया, खाने-पीने की चर्चा की और शरद को रवाना कर दिया. उसके बाद भी शरद यादव ने दिल्ली में मीटिंग की. दबाव से बात नहीं बनी तो तेजस्वी को मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी बताया. लेकिन फिर भी लालू नहीं पिघले.


खत्म हो गयी शरद की सियासत
सियासी जानकार बताते हैं कि शऱद की पॉलिटिक्स अब खत्म हो गयी है. 1970 में समाजवादियों की पार्टी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी(संसोपा) के छात्र विंग से पॉलिटिक्स की शुरूआत करने वाले शरद यादव 1971 में जबलपुर विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष बन गये थे. 1974 में वे लोकसभा के सदस्य चुन लिये गये. तब से उन्होंने कभी पीछे मुडकर नहीं देखा. तीन राज्यों मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार से लोकसभा चुनाव जीतने वाले शरद यादव ने देश में समाजवादियों की राजनीति को दशकों तक अपने आगे-पीछे घुमाया. लेकिन अब उनकी पॉलिटिक्स खत्म होने के साफ संकेत मिल गये हैं.


दरअसल बिहार में नीतीश कुमार उन्हें पहले ही नकार चुके हैं. लालू यादव ने भी किनारे कर दिया है. देश के किसी दूसरे राज्य में किसी पार्टी को उनकी जरूरत नहीं है. लिहाजा सियासत में सेट होने की कोई गुंजाइश बाकी नहीं बचती.


हालांकि बिहार में शरद यादव के बचे-खुचे समर्थकों ने उनके नेतृत्व में बिहार विधानसभा चुनाव में पूरा जोर लगाने का एलान कर दिया है. शरद समर्थक बीनू यादव ने कहा कि शरद के नेतृत्व में नयी पार्टी बनेगी और उसके उम्मीदवार हर सीट पर चुनाव लड़ेगे. शरद यादव राजद से नाराज RLSP, VIP और हम जैसे पार्टियों को एकजुट कर लालू यादव के खिलाफ मोर्चा खोलने की आखिरी कोशिश भी कर सकते हैं. लेकिन उनकी ये कवायद सफल होगी इस पर ज्यादातर लोगों को संदेह है.

PATNA : पटना में आज राज्यसभा चुनाव के लिए आरजेडी के उम्मीदवारों के नाम का एलान के बाद जब शरद यादव समर्थकों ने लालू यादव पर टिकट बेचने का आरोप लगाना शुरू कर दिया तो कई चीजें साफ हो गयी. कभी शरद यादव के शिष्य रहे लालू प्रसाद यादव ने उनकी सियासत का चैप्टर क्लोज कर दिया है. राज्यसभा चुनाव से पहले अपने पुराने पैंतरों को चल रहे शरद यादव के सारे दांव-पेंच का लालू पर कोई असर नहीं हुआ. दीवार पर लिखी इबारत साफ है, शरद अब सियासत के लिए अप्रांसगिक हो गये हैं.


राज्यसभा जाने के लिए बेचैन थे शरद यादव
दरअसल शरद यादव इस दफे राज्यसभा जाने के लिए बेचैन थे. लोकसभा चुनाव के समय ही उनकी राज्यसभा की सदस्यता खत्म हो गयी थी. पिछले दस महीनों से शरद यादव सियासी तौर पर पैदल थे. दिल्ली के लुटियन जोन में मिला बंगला खाली करन के नोटिस लगातार आ रहे थे. सियासत में जमे रहने के लिए लुटियन जोन के बंगले की अहमियत सियासत करने वाला हर शख्स समझता है. लिहाजा शऱद यादव ने हर वो कोशिश की जिससे वो राज्यसभा पहुंच जायें.


काम नहीं आया शरद का पुराना पैंतरा
सियासत में पांच दशकों से जमे रहने वाले शरद यादव अपनी अहमियत बनाये रखने के लिए कुछ पैंतरे लगातार आजमाते रहे हैं. उनमें से एक था-फूट डालो और राज करो. शरद जब तक जडीयू में थे तब तक नीतीश कुमार के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को प्रश्रय दिया. नीतीश दबाव में आये तो शरद की मांग पूरी हुई और शरद ने नीतीश का विरोध करने वालों को खुद ही पार्टी से बाहर भी कर दिया. 2010 में ललन सिंह का मामला हो या फिर उससे पहले उपेंद्र कुशवाहा का मामला. ऐसे हर मामले में शरद यादव पहले नीतीश के खिलाफ आवाज उठाने वालों का साथ देते दिखे और फिर अपनी बात पूरी करवायी.


पिछले कुछ महीनों से जब शरद यादव आरजेडी के सहयोगी दलों के नेताओं उपेंद्र कुशवाहा, जीतन राम मांझी, मुकेश सहनी के साथ ताबड़तोड़ मीटिंग कर रहे थे तो सियासी जानकार इसके मायने समझ रहे थे. शरद यादव लालू पर दबाव बनाना चाह रहे थे. इरादा साफ था कि दबाव में आकर लालू शरद को राज्यसभा भेज दें.


लेकिन शरद की पॉलिटिक्स को दशकों तक नजदीक से देखने वाले लालू किसी दबाव में नहीं आये. पिछले महीने जब शरद यादव लालू से मिलने रिम्स गये तब भी लालू ने राज्यसभा चुनाव या आने वाले विधानसभा चुनाव पर कोई चर्चा ही नहीं की. लालू ने इधर-उधर की बातें. स्वास्थ्य के बारे में बताया, खाने-पीने की चर्चा की और शरद को रवाना कर दिया. उसके बाद भी शरद यादव ने दिल्ली में मीटिंग की. दबाव से बात नहीं बनी तो तेजस्वी को मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी बताया. लेकिन फिर भी लालू नहीं पिघले.


खत्म हो गयी शरद की सियासत
सियासी जानकार बताते हैं कि शऱद की पॉलिटिक्स अब खत्म हो गयी है. 1970 में समाजवादियों की पार्टी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी(संसोपा) के छात्र विंग से पॉलिटिक्स की शुरूआत करने वाले शरद यादव 1971 में जबलपुर विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष बन गये थे. 1974 में वे लोकसभा के सदस्य चुन लिये गये. तब से उन्होंने कभी पीछे मुडकर नहीं देखा. तीन राज्यों मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार से लोकसभा चुनाव जीतने वाले शरद यादव ने देश में समाजवादियों की राजनीति को दशकों तक अपने आगे-पीछे घुमाया. लेकिन अब उनकी पॉलिटिक्स खत्म होने के साफ संकेत मिल गये हैं.


दरअसल बिहार में नीतीश कुमार उन्हें पहले ही नकार चुके हैं. लालू यादव ने भी किनारे कर दिया है. देश के किसी दूसरे राज्य में किसी पार्टी को उनकी जरूरत नहीं है. लिहाजा सियासत में सेट होने की कोई गुंजाइश बाकी नहीं बचती.


हालांकि बिहार में शरद यादव के बचे-खुचे समर्थकों ने उनके नेतृत्व में बिहार विधानसभा चुनाव में पूरा जोर लगाने का एलान कर दिया है. शरद समर्थक बीनू यादव ने कहा कि शरद के नेतृत्व में नयी पार्टी बनेगी और उसके उम्मीदवार हर सीट पर चुनाव लड़ेगे. शरद यादव राजद से नाराज RLSP, VIP और हम जैसे पार्टियों को एकजुट कर लालू यादव के खिलाफ मोर्चा खोलने की आखिरी कोशिश भी कर सकते हैं. लेकिन उनकी ये कवायद सफल होगी इस पर ज्यादातर लोगों को संदेह है.