Nitish Kumar: बिहार में बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पारी समाप्त हो गई है। उन्होंने मंगलवार, 14 अप्रैल 2026 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। 24 नवंबर 2005 से 14 अप्रैल 2026 तक का उनका राजनीतिक सफर सिर्फ दो दशकों का समय नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति के बड़े बदलावों की कहानी है। उनकी पहली कैबिनेट और अंतिम कैबिनेट के फैसलों की तुलना करने पर स्पष्ट दिखता है कि उनकी प्राथमिकताएं “कानून-व्यवस्था और बुनियादी ढांचे” से बदलकर “संस्थागत स्थिरता और राजनीतिक संक्रमण” तक पहुंच गईं।
सुशासन की शुरुआत और सत्ता में वापसी
वर्ष 2005 में बिहार में दो विधानसभा चुनाव हुए। फरवरी 2005 के चुनाव में किसी भी गठबंधन को बहुमत नहीं मिला और विधानसभा भंग कर दी गई। इसके बाद अक्टूबर-नवंबर में हुए चुनाव में बीजेपी-जेडीयू गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला और नीतीश कुमार ने 24 नवंबर 2005 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। अगले ही दिन, 25 नवंबर को उनकी पहली कैबिनेट बैठक हुई, जिसने बिहार की नई दिशा तय की।
यह वह दौर था जब बिहार में अपराध, अपहरण, हत्या और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं चरम पर थीं। नीतीश कुमार ने स्पष्ट संदेश दिया कि “सुशासन पहले”। उन्होंने कानून-व्यवस्था, सड़क, बिजली और प्रशासनिक सुधार को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। जमीन विवादों को अपराध का मुख्य कारण बताते हुए उन्होंने जिलाधिकारियों को लैंड रेवेन्यू कैंप लगाने के निर्देश दिए।
बदलता बिहार और बदलती राजनीति
नीतीश कुमार ने खुद को “सुशासन बाबू” और “विकास पुरुष” के रूप में स्थापित किया। इस दौरान उन्होंने कई बार राजनीतिक गठबंधन बदले कभी बीजेपी के साथ, कभी आरजेडी के साथ। विरोधियों ने उन्हें “पलटू राम” कहा, लेकिन उन्होंने इसे व्यावहारिक राजनीति और सामाजिक संतुलन की रणनीति बताया। उनकी सरकारों में सड़क निर्माण, साइकिल योजना, छात्रवृत्ति, महिला आरक्षण, पंचायत सशक्तीकरण और शराबबंदी जैसे फैसलों ने बिहार के सामाजिक और प्रशासनिक ढांचे को नया आकार दिया। उन्होंने पिछड़े, अति-पिछड़े और महिलाओं को राजनीतिक हिस्सेदारी देकर नया सामाजिक समीकरण भी तैयार किया।
सत्ता का समापन और राजनीतिक संक्रमण
14 अप्रैल 2026 को हुई उनकी अंतिम कैबिनेट बैठक विकास योजनाओं की घोषणा के लिए नहीं, बल्कि सरकार के विघटन की सिफारिश और इस्तीफे की औपचारिक प्रक्रिया को मंजूरी देने के लिए थी। कैबिनेट ने सर्वसम्मति से सरकार भंग करने का प्रस्ताव स्वीकार किया, जिससे संवैधानिक प्रक्रिया के तहत मुख्यमंत्री का इस्तीफा संभव हो सका। यह निर्णय प्रतीकात्मक रूप से एक राजनीतिक युग के अंत जैसा माना जा रहा है। हालांकि नीतीश कुमार ने कहा कि वे नई सरकार को सहयोग और समर्थन देते रहेंगे। इस्तीफे से पहले उन्होंने राज्यपाल से मिलकर कैबिनेट भंग करने की सिफारिश भी की।
2005 बनाम 2026: बदलती प्राथमिकताएं
दोनों कैबिनेट बैठकों की तुलना साफ दिखाती है कि 2005 में फोकस “राज्य को खड़ा करने” पर था, जबकि 2026 में फोकस “राजनीतिक संक्रमण को व्यवस्थित रूप से पूरा करने” पर है। यह बदलाव केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक यात्रा की दिशा को भी दर्शाता है।
एक युग का अंत
नीतीश कुमार की राजनीति का सफर विकास, सामाजिक संतुलन और गठबंधन की राजनीति के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। अब उनके राज्यसभा जाने की चर्चा के बीच बिहार एक राजनीतिक युग के अंत का साक्षी बन रहा है। 2005 का नीतीश जहां “सुशासन बाबू” थे, वहीं 2026 के नीतीश को एक अनुभवी स्टेट्समैन के रूप में देखा जा रहा है, जिन्होंने बिहार की राजनीति को स्थिरता और नई पहचान दी।
