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Bihar Politics: महागठबंधन के गढ़ में पूरी ताकत लगा रहा NDA, औवैसी की पार्टी दिला सकती है जीत

Bihar Politics: किशनगंज बिहार में महागठबंधन का दबदबा रहा है पर इस बार एनडीए पूरी ताकत से मैदान में है। एआइएमआइएम के चुनाव लड़ने से महागठबंधन के वोट बंट सकते हैं जिसका फायदा एनडीए को मिल सकता है।

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बिहार की राजनीतिक में हलचल
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PRIYA DWIVEDI
4 मिनट

Bihar Politics: बिहार का किशनगंज जिला, जहां मुस्लिम आबादी सबसे अधिक है, लंबे समय से महागठबंधन का गढ़ रहा है। लेकिन आगामी विधानसभा चुनाव में इस परिदृश्य के बदलने के पूरे आसार बन रहे हैं। इस बार एनडीए (NDA) पूरी ताकत से मैदान में है और उसे एआईएमआईएम (AIMIM) के स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने से संभावित लाभ की उम्मीद है।


पिछले विधानसभा चुनाव में किशनगंज जिले की चार सीटों में से दो महागठबंधन के पास गई थीं, जबकि दो सीटों पर एआईएमआईएम ने कब्जा जमाया था। बाद में एआईएमआईएम के दो विधायक राजद (RJD) में शामिल हो गए, जिससे फिलहाल चारों सीटों पर महागठबंधन का नियंत्रण है। लेकिन इस बार एआईएमआईएम के अलग चुनाव लड़ने से वोटों के बंटवारे की आशंका है, जिससे एनडीए को सीधा फायदा मिल सकता है।


पिछले चुनाव में किशनगंज सदर सीट पर कांग्रेस के इजहारूल हुसैन ने भाजपा की स्वीटी सिंह को महज 1,381 वोटों से हराया था, जबकि एआईएमआईएम के कमरूल होदा ने 41,904 वोट पाकर तीसरा स्थान हासिल किया। यदि इस बार एआईएमआईएम मैदान में आती है, तो कांग्रेस को इस सीट पर कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।


1952 से ठाकुरगंज सीट कांग्रेस का गढ़ रही है, लेकिन 2020 में राजद के सऊद आलम ने स्वतंत्र उम्मीदवार गोपाल अग्रवाल को 23,000 वोटों से हराया था। जदयू के नौशाद आलम तीसरे और एआईएमआईएम के महबूब आलम चौथे स्थान पर रहे थे। अब गोपाल अग्रवाल ने जदयू जॉइन कर लिया है और वे एनडीए से अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर सकते हैं। हाल ही में एनडीए ने ठाकुरगंज के गांधी मैदान से कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित कर शक्ति प्रदर्शन किया है।


16 चुनावों में से 10 बार कांग्रेस को जीत दिलाने वाली बहादुरगंज सीट पर भी बदलाव देखने को मिला। 2020 में एआईएमआईएम के मोहम्मद अंजार नईमी ने विकासशील इंसान पार्टी के लखन लाल पंडित को हराया था, जबकि कांग्रेस के मोहम्मद तौसीफ आलम तीसरे स्थान पर रहे। नईमी अब राजद में शामिल हो चुके हैं और अगला चुनाव महागठबंधन के टिकट पर लड़ सकते हैं। वहीं, एनडीए भी इस सीट पर मजबूत प्रत्याशी उतारने की रणनीति बना रहा है।


2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई कोचाधामन विधानसभा सीट पर हर चुनाव में नया चेहरा जीतता रहा है। 2010 में राजद के अख्तारुल ईमान ने जदयू के मुजाहिद आलम को 9,025 वोटों से हराया था। हालांकि 2014 के उपचुनाव में मुजाहिद आलम ने जदयू से जीत दर्ज की और 2015 में फिर से विधायक बने। अब मुजाहिद आलम राजद में शामिल हो चुके हैं, जिससे जदयू इस सीट को खाली मानकर फिर से उसे हासिल करने की कोशिश में जुटा है। एनडीए इस सीट को अपना संभावित गढ़ मानकर रणनीति बना रहा है।


किशनगंज जिले की राजनीति में इस बार बड़ा फेरबदल देखने को मिल सकता है। जहां महागठबंधन फिलहाल सभी चार सीटों पर काबिज है, वहीं एआईएमआईएम के स्वतंत्र चुनाव लड़ने से वोटों का बंटवारा तय माना जा रहा है, जिससे एनडीए को अप्रत्याशित फायदा मिल सकता है। आगामी चुनाव में जिले की हर सीट पर मुकाबला दिलचस्प और कांटे का होने वाला है।

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