1st Bihar Published by: First Bihar Updated Tue, 20 Jan 2026 09:10:58 AM IST
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Supreme Court SC/ST Act : सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध नहीं बनता, जब तक यह साबित न हो कि यह भाषा जाति के आधार पर अपमानित करने के इरादे से बोली गई हो।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने एक अपील में की, जिसमें पटना हाईकोर्ट द्वारा एससी/एसटी एक्ट के तहत आपराधिक कार्रवाई जारी रखने के निर्णय को चुनौती दी गई थी। पीठ ने कहा कि इस अधिनियम के तहत कार्रवाई तभी बनती है जब अपमान या धमकी का उद्देश्य पीड़ित को उसके एससी/एसटी होने के कारण किया गया हो।
मामला क्या था?
यह मामला केशव महती बनाम राज्य के खिलाफ था। महती पर आरोप था कि उसने आंगनवाड़ी केंद्र में एक व्यक्ति को जाति-आधारित गाली-गलौज और मारपीट की। इस आरोप के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई और बाद में मामला ट्रायल कोर्ट में चला।
हालांकि, महती ने उच्च न्यायालय में अपील की, जिसमें उन्होंने एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की मांग की। पटना हाईकोर्ट ने इस अपील को खारिज कर दिया और ट्रायल कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा। महती ने फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि न तो प्राथमिकी में और न ही आरोपपत्र में यह आरोप था कि महती ने जाति के आधार पर अपमानित करने या धमकाने के लिए कोई कृत्य किया।पीठ ने स्पष्ट किया कि इस अधिनियम की धारा 3(1) के तहत अपराध तभी होता है जब पीड़ित एससी/एसटी का सदस्य हो, और अपमान या धमकी उसी कारण की जाए कि वह एससी/एसटी है। यानी सिर्फ यह कि शिकायतकर्ता एससी/एसटी है, अपने आप में पर्याप्त नहीं है। कई मामलों में, लोग अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन वह भाषा किसी विशेष जाति-आधारित अपमान के इरादे से नहीं होती। ऐसे मामलों में एससी/एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई उचित नहीं मानी जा सकती।
अदालत ने पूर्व के फैसलों का भी उल्लेख किया
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पहले दिए गए निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि एससी/एसटी एक्ट की धारा 3/18 के तहत दोष सिद्ध करने के लिए दो शर्तें जरूरी हैं।पहली यह कि शिकायतकर्ता एससी/एसटी का सदस्य हो, और दूसरी यह कि अपमान/धमकी उसके एससी/एसटी होने के कारण हो। अदालत ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति सिर्फ अपमानित करता है, लेकिन उसका इरादा जाति-आधारित अपमान नहीं है, तो वह इस अधिनियम के दायरे में नहीं आता। न्यायालय ने कार्रवाई रद्द की इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और पटना हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया और केशव महती के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया।