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बांके बिहारी मंदिर, अनूठी परंपराएं और रहस्यमयी आस्था का केंद्र

मथुरा के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर से जुड़ी परंपराएं और किस्से भक्तों के लिए हमेशा आकर्षण का केंद्र रहे हैं। यह मंदिर भगवान कृष्ण के मोहक स्वरूप का प्रतीक है, और यहां की अनोखी परंपराएं इसे खास बनाती हैं।

Banke Bihari Temple

23-Jan-2025 08:00 AM

By First Bihar

मथुरा में स्थित बांके बिहारी मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि इसकी अनोखी परंपराएं और रहस्यमयी किस्से इसे और भी विशेष बनाते हैं। भगवान कृष्ण के मोहक स्वरूप के दर्शन करने के लिए यहां हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। लेकिन इस मंदिर से जुड़ी एक परंपरा है जो इसे बाकी मंदिरों से अलग बनाती है। यहां भगवान की मूर्ति के सामने हर दो मिनट पर पर्दा डाला जाता है। इस अनोखी परंपरा के पीछे एक गहरी और दिलचस्प कहानी है।


पर्दा डालने की परंपरा की शुरुआत

करीब 400 साल पहले की बात है जब बांके बिहारी मंदिर में पर्दा डालने की परंपरा नहीं थी। भक्त बिना किसी रुकावट के भगवान के दर्शन करते थे। लेकिन एक दिन एक अद्भुत घटना घटी। एक नि:संतान वृद्ध विधवा महिला पहली बार मंदिर में आई और भगवान के मोहक स्वरूप को देखकर भावविभोर हो गई। उस महिला ने भगवान को अपने पुत्र के रूप में स्वीकार करने का निश्चय कर लिया।


भक्त के इस अनूठे प्रेम और वात्सल्य से स्वयं भगवान बांके बिहारी भावुक हो गए और उसके साथ उसके घर तक चले गए। अगले दिन जब मंदिर के पुजारी और श्रद्धालु यह देखकर चिंतित हुए कि भगवान अपनी मूर्ति में नहीं हैं, तो उन्होंने उनकी खोज शुरू की। काफी प्रयासों के बाद भगवान को उस वृद्धा के घर पर पाया गया। भक्तों और पुजारियों ने भगवान से मंदिर लौटने की प्रार्थना की, और बार-बार मनाने के बाद वे मंदिर वापस लौटे।


इस घटना के बाद यह डर बना रहा कि कहीं भगवान किसी और भक्त के प्रेम से आकर्षित होकर फिर से उनके साथ न चले जाएं। इसी कारण हर दो मिनट पर भगवान की मूर्ति के सामने पर्दा डालने की परंपरा शुरू की गई।


पंचांग अनुसार विशेष परंपराएं

बांके बिहारी मंदिर में साल भर कुछ विशेष अवसरों पर भगवान के दर्शन और अनुष्ठान किए जाते हैं। ये परंपराएं भक्तों के लिए बेहद खास होती हैं:


मंगला आरती

– साल में केवल एक बार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन मंगला आरती होती है। यह आरती अत्यधिक शुभ मानी जाती है।


चरण दर्शन

– भगवान बांके बिहारी जी के चरणों के दर्शन साल में सिर्फ एक बार अक्षय तृतीया के दिन कराए जाते हैं।


बंसी और मुकुट धारण करना

– शरद पूर्णिमा के दिन भगवान को बंसी और मुकुट धारण कराया जाता है। यह दिन भक्तों के लिए विशेष आनंद का अवसर होता है।


पर्दा डालने का आध्यात्मिक महत्व

वास्तव में, हर दो मिनट पर पर्दा डालने की परंपरा भक्तों और भगवान के बीच एक खास संतुलन बनाती है। यह भक्तों को यह सिखाती है कि भगवान के स्वरूप को देखने का अनुभव क्षणभंगुर है और उसे पूरे ध्यान और समर्पण से निहारना चाहिए।


बांके बिहारी मंदिर: आस्था का केंद्र

बांके बिहारी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है; यह भगवान और उनके भक्तों के बीच के अनूठे प्रेम का प्रतीक है। यहां की परंपराएं, खासकर हर दो मिनट पर पर्दा डालने की प्रथा, इस बात को दर्शाती हैं कि भगवान अपने भक्तों के प्रति कितने करुणामय और संवेदनशील हैं।


यह मंदिर न केवल मथुरा बल्कि पूरे भारत के भक्तों के लिए आस्था का केंद्र है। इसकी परंपराएं और इसके पीछे की कहानियां भक्तों को भगवान के प्रति और अधिक समर्पित होने की प्रेरणा देती हैं।