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24-Jan-2022 03:43 PM
By FIRST BIHAR EXCLUSIVE
DESK: तकरीबन 6 महीने पहले की बात है, ललन सिंह जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गये थे. उनकी ताजपोशी पर मुहर लगाने के लिए जेडीयू की राष्ट्रीय परिषद की बैठक हुई थी. इस बैठक में जेडीयू नेताओं के एक ग्रुप ने बीजेपी के खिलाफ खुले जंग का एलान कर दिया था. नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताने वाला प्रस्ताव पारित कर दिया. बीजेपी को कोसते-कोसते उसी बैठक में ये भी कह दिया गया कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जेडीयू को बीजेपी से सीट चाहिये और केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह बीजेपी से बात कर वो सीटें दिलवायेंगे. सियासी जानकार उसी दिन से समझ रहे थे कि ये एलान करने वाले जेडीयू के नेताओं का इरादा क्या है.
आरसीपी सिंह से जवाब मांगा गया
जो अंदाजा उस दिन लगाया जा रहा था, वह अब सामने आ गया है. जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह ने अपनी पार्टी के केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह से जवाब मांगा है, यूपी चुनाव में बीजेपी से तालमेल क्यों नही हुआ. एक चैनल से बात करते हुए जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह ने कहा कि केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह से पार्टी ने जवाब मांगा है. उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने क्यों नहीं जेडीयू के लिए सीट छोड़ी.
ललन सिंह ने मीडिया से कहा
“हमने आरसीपी सिंह पर भरोसा किया था, लेकिन हम अंधेरे में रह गए. हमने उनको अधिकृत किया था कि वे बीजेपी से बात करें और उन्होंने भरोसा दिलाया था कि बात हो रही है. आऱसीपी सिंह के भरोसा दिलाने पर ही हम पूरी तरह से आश्वस्त थे कि यूपी में बीजेपी के साथ हमारा तालमेल होगा. आरसीपी सिंह ने हमसे कहा था कि बीजेपी ने उन सीटों की सूची मांगी है जिस पर जेडीयू की दावेदारी है. हमने सूची उन्हें दी और उन्होंने बताया कि सूची को बीजेपी को सौंप दिया गया है. ये डेढ़ महीने पहले की बात है. उसके बाद RCP सिंह लगातार कह रहे थे कि बात हो रही है और हम उसी भरोसे पर रह गये.“
क्या सारी रणनीति आरसीपी सिंह को निपटाने की है
ललन सिंह कह रहे हैं कि आरसीपी सिंह के भरोसे में नहीं रहते तो जेडीयू उत्तर प्रदेश में बहुत मजबूती से चुनाव लडती. जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ये भी कह रहे हैं कि उन्हें कुछ नहीं मालूम था कि यूपी में बीजेपी से तालमेल को लेकर क्या बातचीत हो रही थी. सब आरसीपी सिंह को मालूम था. वे ही बात कर रहे थे और वे ही बता सकते हैं कि बीजेपी की ओर से उन्हें क्या आश्वासन मिल रहा था. सारी बातों का मतलब साफ है-यूपी में जेडीयू की दुर्दशा के लिए सिर्फ और सिर्फ आरसीपी सिंह जिम्मेवार हैं. हालांकि ये बात खुलकर कही नहीं जा रही है. लेकिन जो बातें कहीं जा रही हैं उनका मतलब यही है.
जेडीयू को पहले से पता था कि बीजेपी तालमेल नहीं करेगी
वैसे, आरसीपी सिंह के माथे दोष मढ रहे जेडीयू नेताओं को भी भली-भांति मालूम था कि बीजेपी यूपी में उनके लिए एक भी सीट नहीं छोड़ने जा रही है. यूपी में जेडीयू के प्रभारी हैं पार्टी के राष्ट्रीय प्रधान महासचिव केसी त्यागी. डेढ महीने पहले केसी त्यागी के बेटे अमरीश त्यागी जदयू छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गये थे. चुनाव से पहले बीजेपी का दामन थामने का मकसद साफ था, चुनाव में टिकट हासिल करना. अगर बीजेपी जेडीयू के लिए सीट छोड़ने ही वाली थी तो केसी त्यागी के बेटे को अपनी पार्टी क्यों छोड़नी पड़ती.
बात इतनी ही नहीं, सवाल ये था कि बीजेपी वैसे पार्टी के लिए एक भी सीट क्यों छोड़ती जिसका उस राज्य में कहीं कोई जनाधार है ही नहीं. हम आपको जेडीयू का उत्तर प्रदेश के चुनाव में प्रदर्शन की याद दिला दें. नीतीश की पार्टी ने 2017 का यूपी विधानसभा चुनाव नहीं लडा था. हां, उससे पहले 2012 का विधानसभा चुनाव जरूर लड़ा था. उस दौर में भी नीतीश का बिहार में बीजेपी के साथ गठबंधन था लेकिन यूपी में बीजेपी ने तालमेल करने से साफ इंकार कर दिया था. लिहाजा जेडीयू ने पूरी ताकत लगाकर उत्तर प्रदेश की दो सौ से ज्यादा सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. खुद नीतीश कुमार प्रचार करने गये थे. बिहार के तमाम छोटे-बड़े जेडीयू नेताओं को उत्तर प्रदेश में कैंप करा दिया गया था. जब रिजल्ट आया तो जेडीयू की हैसियत भी सामने आ गयी. एक भी सीट पर जेडीयू की जमानत तक नहीं बची. ज्यादा सीट ऐसी थी कि जहां जेडीयू उम्मीदवार को 500 से भी कम वोट मिले थे.
पिछले चुनाव में जिस पार्टी ने एक भी सीट पर जमानत तक नहीं बचायी हो, उस पार्टी के लिए कोई सत्तारूढ दल क्यों सीट छोड़ेगा. दिलचस्प बात ये है कि जो बिहार जेडीयू की सारी जमा पूंजी है वहीं वह तीसरे नंबर की पार्टी है. उसके लिए यूपी में सीट छोड़ने का सवाल कहा था. लिहाजा सियासी समझ रखने वाले ही नहीं बलकि जेडीयू के सारे नेता भी समझ रहे थे कि बीजेपी कुछ नहीं करने जा रही है. सीट देने की बात तो दूर वह तालमेल के लिए बातचीत भी नहीं करने जा रही है. इसके बावजूद अगर बार बार आऱसीपी सिंह को कहा जा रहा था कि वे बीजेपी से बात करें तो इरादा कुछ औऱ था.
मंत्री बनने के बाद शुरू हुआ था जेडीयू का बखेड़ा
बिहार की सियासत की समझ रखने वाला हर कोई ये जानता है कि जेडीयू का सारा बखेड़ा पिछले साल जुलाई में तब शुरू हुआ था जब केंद्र में मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ था. आरसीपी सिंह मंत्री बन गये थे औऱ उसके बाद ही मंत्री न बन पाने की कसक पाल बैठे नेताओं ने आरसीपी सिंह को ठिकाने लगाने की रणनीति तैयार करनी शुरू कर दी थी. यूपी तो सिर्फ एक बहाना था, असल निशाना जहां साधना था वहां साधा जा रहा है.
हालांकि अभी भी खेल अधूरा है. असली खेल तो अगले एक-महीने में होगा. जेडीयू के अंदर बहुत कुछ पक रहा है. वोट पाने में कमजोर साबित हुए नीतीश कुमार पार्टी के अंदर भी उतने मजबूत नहीं रह गये हैं, जितना 2020 के विधानसभा चुनाव से पहले हुआ करते थे. ये साफ दिख रहा है कि स्थितियां नीतीश कुमार के नियंत्रण से भी बाहर होती जा रही है. ऐसे में आने वाले दिनों में जो कुछ भी होगा वह बेहद दिलचस्प होगा.