Bihar Crime News: बिहार में जीजा ने साले को मारी गोली, बहन को विदा कराने पहुंचा था युवक Bihar Crime News: बिहार में बाइक सवार युवक की संदिग्ध मौत, परिजनों ने हत्या की जताई आशंका Patna Metro : पटना मेट्रो अपडेट: भूतनाथ रोड से मलाही पकड़ी तक सेवा 20 दिसंबर से शुरू, पूर्वी पटना को बड़ी राहत Bihar Ias Officer: बिहार से बाहर हैं 30 IAS अफसर...इनमें 2 तो अगले साल रिटायर हो जाएंगे, कई बिहार वापस आना चाहते हैं, पर... Bihar road accident : सहरसा में अनियंत्रित ट्रक ने दो परिवारों के घरों में तोड़ा हमला, छात्र समेत कई लोग घायल Jamui accident : बालू लदे ट्रक की चपेट में महिला की मौत, ग्रामीणों ने चालक को बंधक बनाकर सड़क जाम किया क्या है हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6? 12 साल बाद महिला ने 7 भाइयों से जीती कानूनी लड़ाई, शादीशुदा लड़कियों के लिए नजीर है यह फैसला luxury apartments India : भारत में अमीरों की लग्जरी हाउसिंग में दिलचस्पी बढ़ी, बड़े ब्रांडेड प्रोजेक्ट्स की मांग तेज; आप भी खरीदने जा रहे तो समझ लें पूरी बात Bihar higher education expansion : बिहार के छह जिलों के 44 प्रखंडों में नए डिग्री कॉलेज खुलेंगे, जमीन भी चिह्नित; जानिए क्या है ख़ास Bihar assembly elections 2025 : एनडीए विरोधी गतिविधियों और भीतरघात की पड़ताल, जिलों से मिली रिपोर्ट पर जदयू करने जा रही सख्त कार्रवाई
29-Nov-2025 12:32 PM
By First Bihar
गुजरात हाईकोर्ट ने हाल ही में एक ऐसा अहम फैसला सुनाया है जो बेटियों के पैतृक संपत्ति में अधिकार के मामले में नजीर साबित होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बेटी का पैतृक संपत्ति में अधिकार न तो शादी के कारण समाप्त होता है और न ही परिवार द्वारा उसका नाम रिकॉर्ड से हटाने पर। यह फैसला खास तौर पर उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है जिनके भाई शादी के बाद उन्हें पैतृक संपत्ति से बेदखल करने की कोशिश करते हैं।
इस मामले में एक महिला ने अपने सात भाइयों और बहनों के खिलाफ 12 साल की कानूनी लड़ाई जीतकर साबित कर दिया कि बेटियों का जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे छीना नहीं जा सकता। यह निर्णय महिलाओं के अधिकारों के मामले में एक बड़ी जीत माना जा रहा है।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 क्या कहती है?
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 6 बेटियों को उनके पिता की संपत्ति में पुत्रों के समान अधिकार देती है। प्रारंभ में बेटियों को केवल सह-उत्तराधिकारी के रूप में पहचान दी गई थी, लेकिन 2005 में इस अधिनियम में संशोधन के बाद बेटियों को औपचारिक रूप से सह-उत्तराधिकारी का दर्जा मिला। इसका मतलब है कि पिता की पैतृक संपत्ति में बेटा और बेटी दोनों का जन्म से बराबर का हिस्सा होता है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि बेटी की शादी इस अधिकार को प्रभावित नहीं करती। चाहे परिवार शादी के बाद संबंध तोड़ ले या बेटी का नाम रिकॉर्ड से हटाए, उसका कानूनी अधिकार समाप्त नहीं होता। केवल तब ही बेटी का अधिकार खत्म हो सकता है जब वह स्वयं लिखित रूप में त्यागपत्र दे या अदालत का आदेश इसके लिए आए।
12 साल बाद भी महिला ने जीती संपत्ति में हिस्सेदारी
अक्सर कहा जाता है कि किसी संपत्ति से जुड़े मामलों में समय सीमा (limitation) के कारण बेटियों को कठिनाई होती है। लेकिन गुजरात हाईकोर्ट ने हालिया मामलों में इस धारणा को चुनौती दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पैतृक संपत्ति में बेटी सह-उत्तराधिकारी होती है और उसका हिस्सा हमेशा बना रहता है। रिकॉर्ड में नाम न होने पर भी अधिकार खत्म नहीं होता।
पहले मामले में एक पटेल महिला शामिल थी, जिसने एक ओबीसी युवक से शादी की और उसके बाद परिवार ने उसे छोड़ दिया। उनके पिता का 1986 में निधन हो गया था, लेकिन संपत्ति के रिकॉर्ड में उसके सात भाई-बहनों का नाम था और उसका नहीं। महिला को यह जानकारी 2018 में मिली और उसने अपने हिस्से (1/8) के लिए मुकदमा दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने कहा कि मामला 12 साल बाद दाखिल किया गया है इसलिए यह अस्वीकार्य है। लेकिन हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश पलट दिया और कहा कि अधिकार जन्म से है और लिमिटेशन लागू नहीं होती।
दूसरा मामला अहमदाबाद का था। एक महिला ने अपनी जाति के बाहर शादी की थी। उसने अपने दिवंगत पिता द्वारा खरीदी गई घाटलोडिया क्षेत्र की संपत्ति को मां और भाई द्वारा बेचने से रोकने के लिए 2013 में केस दाखिल किया। परिवार ने दावा किया कि उसने उनसे संबंध तोड़ दिए थे। हालांकि, 2008 में वह वापस आई और उसे वेजलपुर का फ्लैट रहने के लिए दिया गया, लेकिन भाई ने कहा कि महिला ने वहां गलत तरीके से कब्जा कर लिया।
मामला अदालत तक गया और मई 2022 में सिविल कोर्ट ने भाई को विवादित संपत्तियों को बेचने से रोक दिया। कोर्ट ने कहा कि ये संपत्तियां अविभाजित सह-उत्तराधिकारी संपत्तियां हैं और बहन का भी बराबर का हिस्सा है। साथ ही यह आरोप कि बहन ने वेजलपुर निवास पर कब्जा कर लिया, कोर्ट ने खारिज कर दिया। बाद में भाई ने जिला अदालत में चुनौती दी, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली।
बेटियों के अधिकार की पुष्टि
गुजरात हाईकोर्ट का यह फैसला बेटियों के अधिकारों के लिए मील का पत्थर है। कोर्ट ने साफ किया कि बेटियों का जन्मसिद्ध अधिकार केवल शादी या पारिवारिक विवाद से प्रभावित नहीं होता। इसके अलावा, यह फैसला यह संदेश भी देता है कि पैतृक संपत्ति में बेटियों की हिस्सेदारी हमेशा सुरक्षित रहती है और उसका हनन नहीं किया जा सकता।
यह निर्णय महिलाओं को कानूनी तौर पर सशक्त बनाने की दिशा में एक अहम कदम है और परिवार या समाज में बेटियों के अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाएगा। अब बेटियों को उनके जन्मसिद्ध अधिकार के लिए अदालत में लड़ने की जरूरत महसूस होने पर भी यह स्पष्ट है कि समय सीमा उनका अधिकार नहीं छीन सकती।