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कुमार प्रबोध का ब्लॉग: पप्पू यादव खुद के लिए कब खड़े होंगे? भीड़ और भरोसे का फर्क समझना ही होगा

कुमार प्रबोध के इस ब्लॉग में पप्पू यादव की राजनीति, उनकी ऊर्जा, संघर्ष और सबसे बड़ी कमी—साख—पर गहन विश्लेषण किया गया है। लेख बताता है कि भीड़ और भरोसे के फर्क को समझे बिना कोई नेता बड़ा क्यों नहीं बन पाता।

08-Feb-2026 07:53 PM

By First Bihar

PATNA:  पप्पू यादव से अपना संबंध करीब 22-23 सालों का है. लव एंड हेट वाला. कभी खूब दोस्ती तो कभी एक-दूसरे को देख लेने वाली दुश्मनी. दो दशक से ज्यादा समय ऐसे ही गुजरा है. वैसे मेरे लिए ये कोई नई बात है नहीं. बिहार के ज्यादातर बड़े नेताओं से संबंध कुछ ऐसे ही रहे हैं. उनकी कहानी फिर कभी, अभी तो बात पप्पू यादव की. 


मुझे इसमें कोई शक नहीं है कि पप्पू यादव पर सरकार की कुदृष्टि के पीछे नीट छात्रा कांड है. पप्पू यादव जिस मुखरता से इस मामले को उठा रहे थे, उससे सरकार पूरी तरह असहज थी. सरकार को अपनी बेचैनी कम करने का रास्ता पटना की कोर्ट से मिल गया, जिसने 31 साल पुराने मामले में पप्पू यादव के खिलाफ पहले गिरफ्तारी औऱ फिर कुर्की जब्ती का वारंट निकाल रखा था. 


वैसे, 6 फरवरी की रात मेरे लिए ये देखना भी दिलचस्प था कि पप्पू यादव को गिरफ्तार करने के लिए पटना पुलिस को दानापुर से अपने सिटी एसपी(वेस्ट) को बुलाना पड़ा. पप्पू यादव के खिलाफ जिस मामले में वारंट निकला था वह पटना के गर्दनीबाग थाने में दर्ज हुआ था. पप्पू यादव जिस घर से गिरफ्तार हुए वह बुद्धा कॉलनी थाना क्षेत्र में पड़ता है. ये दोनों थाने पटना के सिटी एसपी(मध्य) के अधीन आते हैं. लेकिन सिटी एसपी(मध्य) कहीं नजर नहीं आयीं.  


लेकिन, अभी तो मैं बात करने बैठा हूं पप्पू यादव की राजनीति की. कुछ देर पहले पप्पू यादव पर शिवानंद तिवारी जी का पोस्ट पढ़ रहा था. उनकी ढ़ेर सारी बातों से सहमत भी हूं. वाकई पप्पू यादव जैसी ऊर्जा और फुर्ती मैंने बिहार के किसी दूसरे नेता में नहीं देखी है. ना ही गरीबों की मदद करने वाले उनके जैसा कोई दूसरा नेता देखा है. कोरोना का दौर हो या पटना में भीषण जलजमाव का समय, सिर्फ पप्पू यादव ही रहनुमा बनकर सड़क पर खड़े दिखे. मैंने 7-8 साल पहले दिल्ली में उनके सरकारी आवास को भी देखा था, जो बिहार के कोने-कोने से आये मरीजों की आश्रयस्थली था. मरीजों और परिजनों को दो टाइम का भोजन मिल रहा था. सुबह-सुबह दो दिन गाड़ियां वहां से एम्स के लिए खुलती थीं, जहां पुर्जा कटवाने से लेकर डॉक्टर तक पहुंचाने का काम भी पप्पू यादव के सहयोगियों के जिम्मे था.  बिना-जाति धर्म और क्षेत्र देखे, पप्पू के पास जो पहुंच जाये उसे मदद मिल जाना तय था.  


इन सारी बातों के बीच मेरे जैसे इंसान के जेहन में ये सवाल अक्सर उठा कि इतना कुछ करने बावजूद पप्पू राजनीति में लगातार फेल क्यों हो जा रहे हैं. ये सही है कि वे निर्दलीय सांसद बन गये. लेकिन पूर्णिया की इस बार की जीत में नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव और उनकी किस्मत का ज्यादा योगदान रहा. खैर, जीत तो जीत होती है. लेकिन सवाल ये उठता है कि पानी से डूबे पटना में ट्रैक्टर औऱ जेसीबी से घूम कर राहत बांटने वाले पप्पू यादव, कोरोना में पूरे बिहार के लोगों की मदद करने वाले पप्पू यादव पटना और पूरे बिहार के नेता क्यों नहीं बन पा रहे. डेढ़ साल पहले तक वे जन अधिकार पार्टी (JAP) को चला रहे थे. उसे लोगों ने सिरे से खारिज क्यों कर दिया. 


करीब दो साल पहले ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की लीडरशिप पर किताब Lessons for the 21st Century पढ़ी थी.  उससे काफी पहले जॉन एफ. केनेडी ऑन लीडरशिप भी पढा था. मेरा दिमाग उन्हीं किताबों के पैमानों पर पप्पू यादव को परखता है औऱ फिर इस सवाल का जवाब मांगता है कि पप्पू यादव की राजनीतिक यात्रा एक सांसद होने मात्र तक ही क्यों सिमट जाती है. जवाब मिलता भी है-पप्पू यादव ने नेता बनने के सबसे बड़े और बुनियादी राजनीतिक सिद्धांत का कभी पालन नहीं किया. वह सिद्धांत है- नैतिक ईमानदारी और जिम्मेदारी. पप्पू यादव ने सेवा औऱ संघर्ष तो खूब किया लेकिन वे अपनी साख नहीं बना पाये. बिहार के ज्यादातर लोग अभी भी उन्हें विश्वास के योग्य नहीं मानते हैं और मेरा मानना है कि इसके लिए पप्पू यादव खुद जिम्मेवार हैं. वे समझ ही नहीं पा रहे हैं कि समाज भीड़ से नहीं, भरोसे से चलता है. 


लॉरेंस विश्नोई मामले में हमने उनकी धर्मपत्नी श्रीमती रंजीत रंजन का बयान चलाया तो एक दिन बाद पप्पू यादव का कॉल आया-मैं भी आपके खिलाफ बोल सकता हूं. मैंने जवाब दिया-बोलिये, लेकिन उसके पहले अपने अंदर झांकिये. बिहार के ज्यादातर लोग मान रहे हैं कि आप सुरक्षा बढ़ाने के लिए ल़ॉरेंस विश्नोई की कहानी गढ़ रहे हैं. इससे आपकी साख खराब हो रही है. पप्पू.यादव मानने को तैयार नहीं थे. कुछ दिन बाद पुलिस ने प्रेस कांफ्रेंस कर उस आदमी को पेश किया जो दिल्ली में बैठकर दुबई के नंबर से पप्पू यादव को कथित धमकी दे रहा था. पुलिस ने कहा- धमकी देने वाला आदमी पप्पू यादव से जुड़ा हुआ था. 


करीब एक साल पहले देर रात मैं पटना के एक कॉफी शॉप में पहुंचा तो पप्पू यादव वहां कोल्ड कॉफी पीते मिल गये. बात होने लगी तो मैंने उनसे कहा-समाज उसे नेता मानता है, जो विद्रोही तेवर का होता है. याचक और चाटुकार कभी नेता नहीं हो सकता. लेकिन पप्पू यादव नहीं समझे. वे धक्के खाकर भी राहुल गांधी की गाड़ी पर चढ़ने के लिए व्याकुल दिखे. राहुल गांधी की गाड़ी के नीचे बैठकर रोते दिखे. प्रियंका गांधी की सभा में उनके सामने जाकर खड़े हो गये कि मुझे भी बोलने का मौका दे दीजिये. कांग्रेस की बैठक में बिना बुलाये पहुंच गये. कहीं बयान दे दिया कि तेजस्वी मुख्यमंत्री बन गये तो मुझे बिहार छोड़ कर भाग जाना पड़ेगा, अगले दिन इससे मुकर गये. ऐसे उदाहरणों की तादाद काफी बढी है. 


कॉफी की चुस्कियों के साथ ही मैंने उन्हें कहानी सुनाई थी. बचपन में मैंने देखा था कि यादव सम्मेलन हुआ था और रामलखन सिंह यादव को ताज पहना कर रथ पर बिठाकर पूरे शहर में घुमाया गया था. उनका नामकरण किया गया था-गोप का पोप. एक वक्त वह भी आया जब रामलखन सिंह यादव अपने घर में पड़े थे और उन्हें कोई देखने तक नहीं आता था. मैं उस समय उनसे मिलने गया था. रामलखन सिंह यादव कमजोर पड़े थे तो उनकी सारी राजनीतिक औऱ सामाजिक पूंजी लालू प्रसाद यादव के खाते में ट्रांसफर हो गयी थी. तब लालू यादव ने विद्रोही तेवर दिखाये थे और रामलखन बाबू अपनी पूंजी को बेटे के पास ट्रांसफर नहीं करा पाये थे. आज लालू प्रसाद यादव कमजोर पड़े हैं. इस कहानी के सार को पप्पू यादव समझ नहीं पाये. 


आज पप्पू यादव से फिर कहने को जी चाह रहा है. आप में कई खराबियां हैं, लेकिन कई ऐसे गुण भी हैं जो बिहार के किसी दूसरे नेता में नहीं हैं. ये त्रासद सत्य है कि नीट छात्रा कांड को भी लोग कुछ दिनों बाद भूल जायेंगे. जैसे कोरोना के समय सरकार द्वारा दी गयी मौत को भूल गये. जैसे पटना जलजमाव के समय सरकार की संवेदनहीनता को भूला बैठे. लेकिन आप फॉलोअर नहीं लीडर बनिये. आखिरकार, अपने बूते सांसद बन कर आया व्यक्ति क्यों लगातार बेईज्जत होकर किसी की चाटुकारिता करेगा. जिसके साथ जनता हो उसे सुरक्षा के लिए प्रपंच करने की क्या जरूरत?  एक बार अपनी साख को बहाल कीजिये और फिर देखिये क्या होता है. सबके लिए खड़े होईये लेकिन उससे पहले खुद के लिए खड़े हो जाइये.