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24-Feb-2026 07:46 AM
By First Bihar
Bihar Legislative : डिजिटल दौर में मोबाइल का बढ़ता इस्तेमाल अब नई चिंता बनता जा रहा है। खासकर बच्चों और किशोरों में रील्स, ऑनलाइन गेम और लगातार स्क्रॉलिंग की आदत तेजी से बढ़ रही है। इसी गंभीर विषय को लेकर सोमवार को विधानसभा में विस्तृत चर्चा हुई। बहस के बाद राज्य सरकार ने बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने के लिए नई और व्यापक पॉलिसी लाने का ऐलान किया है।
पश्चिम चंपारण जिले के सिकटा विधानसभा क्षेत्र से जदयू विधायक समृद्ध वर्मा ने यह मुद्दा सदन में उठाया। उन्होंने कहा कि गांवों तक स्मार्टफोन की पहुंच बढ़ने के साथ बच्चे घंटों मोबाइल पर यूट्यूब, सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स में व्यस्त रहते हैं। इससे पढ़ाई पर असर पड़ रहा है और मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है। वर्मा ने सरकार से तय आयु वर्ग के अनुसार स्क्रीन टाइम सीमा निर्धारित करने की मांग की। उन्होंने इसे केवल तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ा गंभीर विषय बताया। उनका कहना था कि आईटी, शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग को मिलकर समन्वित रणनीति बनानी होगी।
राज्य की आईटी मंत्री Shreyasi Singh ने सदन में जवाब देते हुए कहा कि बच्चों में बढ़ती डिजिटल निर्भरता एक गंभीर चिंता का विषय है। भारत सरकार ने भी इस संबंध में कई दिशा-निर्देश जारी किए हैं। बिहार सरकार बहुविभागीय दृष्टिकोण अपनाते हुए ठोस नीति तैयार करेगी। उन्होंने बताया कि बेंगलुरु स्थित National Institute of Mental Health and Neurosciences (NIMHANS) से विशेषज्ञ सलाह मांगी गई है। संस्थान की रिपोर्ट मिलने के बाद राज्य सरकार मानक तय करेगी और उसके आधार पर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे।
डिप्टी सीएम Samrat Choudhary ने भी स्पष्ट किया कि सरकार बच्चों के हित में व्यापक डिजिटल नीति पर काम कर रही है। उन्होंने कहा कि तकनीक से दूर रहना समाधान नहीं है, बल्कि संतुलित और सुरक्षित उपयोग सुनिश्चित करना आवश्यक है। राज्य सरकार चाहती है कि बच्चे डिजिटल माध्यम से सीखें भी और सुरक्षित भी रहें।
विधायक समृद्ध वर्मा ने बच्चों में बढ़ती स्क्रीन एडिक्शन को “अदृश्य महामारी” करार दिया। उन्होंने कहा कि लगातार रील्स देखने से दिमाग में डोपामाइन का प्रभाव बढ़ता है, जिससे बच्चों की एकाग्रता कमजोर होती है और वास्तविक जीवन की गतिविधियां उन्हें नीरस लगने लगती हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब सरकार करोड़ों बच्चों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिखाने की योजना बना रही है, तो डिजिटल लत से बचाने के लिए सुरक्षा तंत्र भी जरूरी है। उन्होंने इसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट घोषित करने की मांग की।
सदन में उन्होंने कई सुझाव भी दिए। वर्मा ने कहा कि स्कूल पाठ्यक्रम में ‘डिजिटल हाइजीन’ को शामिल किया जाए, ताकि बच्चों को कम उम्र से ही मोबाइल के संतुलित उपयोग की शिक्षा मिल सके। जिला स्तर पर एडिक्शन क्लीनिक खोले जाएं, जहां स्क्रीन लत से जूझ रहे बच्चों को परामर्श और इलाज मिल सके। इसके अलावा जीविका दीदियों के माध्यम से गांव-गांव जागरूकता अभियान चलाने का प्रस्ताव भी रखा गया, ताकि अभिभावकों को डिजिटल जोखिमों के बारे में जानकारी मिल सके।
सरकार के इस ऐलान के बाद उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में बिहार बच्चों के सुरक्षित डिजिटल भविष्य के लिए एक मॉडल नीति पेश करेगा। अब सबकी नजर NIMHANS की रिपोर्ट और सरकार की आगामी कार्ययोजना पर टिकी है।