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इंदिरा के शासनकाल में भी उठी थी वन नेशन-वन इलेक्शन, जानिए किसे होगा फायदा और किन्हें उठाना होगा नुकसान

DESK : विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ करवाने की राह अब आसान हो गई है। एक देश एक चुनाव के प्रस्ताव को आज मोदी कैबिनेट से मंजूरी मिल गई है। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्य

इंदिरा के शासनकाल में भी उठी थी वन नेशन-वन इलेक्शन, जानिए किसे होगा फायदा और किन्हें उठाना होगा नुकसान
Tejpratap
Tejpratap
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DESK : विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ करवाने की राह अब आसान हो गई है। एक देश एक चुनाव के प्रस्ताव को आज मोदी कैबिनेट से मंजूरी मिल गई है। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनी कमेटी की रिपोर्ट के बाद इस प्रस्ताव को कैबिनेट में मंजूरी मिल गई है। बीते कल ही एक पत्रकार वार्ता के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने भी इसके संकेत दिए थे।


'वन नेशन, वन इलेक्शन' कोई आज की बात नहीं है। इसकी कोशिश 1983 से ही शुरू हो गई थी और तब इंदिरा गांधी ने इसे अस्वीकार कर दिया था। लेकिन जबसे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, ये मुद्दा उठता रहा है। बीजेपी के 2014 के घोषणा पत्र में भी इसका ज़िक्र रहा है। ऐसा कहा जाता है कि चुनावों में ब्लैक मनी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है और अगर एक साथ चुनाव होते हैं तो इसमें काफ़ी कमी आएगी। इसके अलावा दूसरे चुनाव खर्च का बोझ कम होगा। साथ ही साथ समय कम जाया होगा और पार्टियों और उम्मीदवारों पर खर्च का दबाव भी कम होगा। 


जानकारी हो कि पार्टियों पर सबसे बड़ा बोझ इलेक्शन फ़ंड का होता है। ऐसे में छोटी पार्टियों को इसका फायदा मिल सकता है क्योंकि विधानसभा और लोकसभा के लिए अलग अलग चुनाव प्रचार नहीं करना पड़ेगा। लेकिन, ऐसा कहा जा रहा है कि एक साथ चुनाव कराए जाने का अंततः सबसे अधिक फ़ायदा बीजेपी और कांग्रेस जैसी बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों का होगा और छोटी पार्टियों के लिए एक साथ कई राज्यों में स्थानीय और लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान चलाना कठिन हो सकता है। अगर ऐसा होता है तो बीजेपी और एनडीए का फ़ायदा ये होगा कि प्रधानमंत्री को प्रचार का समय मिलेगा और फोकस होकर वो प्रचार अभियान चला सकेंगे। प्रधानमंत्री अभी भी सबसे लोकप्रिय चेहरा हैं और उनकी अपील है। सबसे बड़ी बात कि उन्हें हर छह आठ महीने में पसीना नहीं बहाना पड़ेगा। 


दरअसल,एक देश एक चुनाव के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने इसी साल 14 मार्च को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। वन नेशन वन इलेक्शन की यह रिपोर्ट 18 हजार 626 पेज की है। 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से दिए गए भाषण में वन नेशन-वन इलेक्शन का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि बार-बार चुनाव देश की प्रगति में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं।


पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनी कमेटी की रिपोर्ट के बाद इस प्रस्ताव को कैबिनेट में मंजूरी मिल गई है। शीतकालीन सत्र में एनडीए सरकार यह बिल संसद में लेकर आएगी। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अगुवाई बनी समिति ने 62 राजनीतिक पार्टियों से संपर्क किया था। इनमें से 32 ने एक देश, एक चुनाव का समर्थन किया था। जबकि, 15 पार्टियां इसके विरोध में थीं। 15 ऐसी पार्टियां थीं, जिन्होंने कोई जवाब नहीं दिया था। एनडीए सरकार में बीजेपी के अलावा चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी, नीतीश कुमार की जेडीयू और चिराग पासवान की एलजेपी (आर) बड़ी पार्टियां हैं। जेडीयू और एलजेपी (आर) तो एक देश, एक चुनाव के लिए राजी हैं, जबकि टीडीपी ने इस पर कोई जवाब नहीं दिया है। जेडीयू और एलजेपी (आर) ने एक देश, एक चुनाव का ये कहते हुए समर्थन किया था कि इससे समय और पैसे की बचत हो सकेगी।