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Kashmir terror violence: आतंक और त्रासदी का स्वर्ग...कश्मीर में पिछले 3 दशक में 46,000 मौतें!

Kashmir terror violence: कश्मीर घाटी, जो कभी "धरती का स्वर्ग" कहलाती थी ,लेकिन पिछले तीन दशकों में इस घाटी ने न सिर्फ आंतरिक संघर्षों और विस्थापन को सहन किया, बल्कि इसने हजारों मासूम जिंदगियाँ भी खोई हैं।

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कश्मीर घाटी, जो कभी "धरती का स्वर्ग" कहलाती थी, अब आतंकवाद की चपेट में आकर खौफ और त्रासदी का अड्डा ब
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Nitish Kumar
Nitish Kumar
6 मिनट

Kashmir terror violence: कभी "धरती का स्वर्ग" कही जाने वाली कश्मीर घाटी, पिछले तीन दशकों से आतंकवाद की त्रासदी झेल रही है। 1990 से लेकर 2024 तक इस खूबसूरत वादी में न सिर्फ गोलियों की गूंज सुनाई दी, बल्कि हर गोली के साथ किसी घर का चिराग बुझा, किसी माँ की गोद सूनी हुई। 


सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले तीन दशक में 46,000 से अधिक जानें जा चुकी हैं | जिनमें मासूम नागरिक, सुरक्षाबल और आतंकवादी शामिल हैं। ये संख्या सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि टूटे हुए परिवारों, उजड़े सपनों और हमेशा के लिए खामोश हो चुके चेहरों की दास्तान है।


इस हिंसा का सबसे ताजा और दिल दहला देने वाला उदाहरण पहलगाम से सामने आया है, जहां केवल धार्मिक पहचान और कलावा देखकर 27 लोगों को गोलियों से भून दिया गया। यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि आतंक अब इंसान की पहचान नहीं, उसकी आस्था तक को निशाना बना रहा है। कश्मीर में अब डर सिर्फ गोलियों का नहीं है, बल्कि उस सोच का है जो किसी की पूजा पद्धति या कलाई पर बंधे एक धागे से उसकी मौत तय कर देती है। घाटी में हर सूरज अब शांति की नहीं, किसी नए जनाज़े की आहट लेकर आता है।

90 के दशक से शुरू हुआ आतंक का तांडव

1990 के दशक की शुरुआत में पाकिस्तान समर्थित (Pakistani backed) आतंकी संगठनों ने कश्मीर में सक्रियता बढ़ाई। हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे समूहों ने घाटी में कई बड़े हमलों को अंजाम दिया। इसी दौरान हजारों कश्मीरी पंडितों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा था | जो कश्मीर के सामाजिक ताने-बाने पर गहरा आघात था।और देश भर में अभी भी इस घटना की चर्चा होती है |


प्रमुख आतंकी घटनाएं जो देश को दहला गईं

2001: जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर हमला, 38 लोगों की मौत

2002: कालूचक छावनी पर फिदायीन हमला, 31 की मौत

2016: उरी सैन्य अड्डे पर हमला, 19 जवान शहीद

2019: पुलवामा आत्मघाती हमला, 40 सीआरपीएफ जवान शहीद

इन हमलों के जवाब में भारत सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयरस्ट्राइक जैसे कड़े कदम उठाए, जिसने आतंकवादियों के नेटवर्क पर गहरा असर डाला था| सरकारी आंकड़ों के अनुसार: आम नागरिकों की मौतें: 14,000+, सुरक्षाबलों के शहीद: 7,000+, आतंकियों की मौतें: 25,000.कुल 46 हजार से अधिक लोगों की जानें गयी हैं |


2021 के बाद नया ट्रेंड: टारगेट किलिंग का उभार

हाल के वर्षों में आतंकवाद ने एक नई दिशा ली है। 2021 से लेकर 2024 तक घाटी में टारगेट किलिंग की घटनाओं में तेजी देखी गई। आतंकियों ने विशेष रूप से अल्पसंख्यक समुदायों, प्रवासी मजदूरों और सरकारी कर्मचारियों को निशाना बनाया था |  जिससे घाटी में असुरक्षा की भावना और बढ़ गई।


बदलता चेहरा: गुरिल्ला से हाइब्रिड आतंकवाद 

कभी घने जंगलों में छिपने वाले गुरिल्ला आतंकी अब नए अवतार में सामने आ रहे हैं। अब आतंकवाद ने एक और खतरनाक मोड़ लिया है| जिसे विशेषज्ञ 'हाइब्रिड आतंकवाद' कह रहे हैं। अब हमलावर आम कश्मीरी युवा होते हैं, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होता। ये ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर कट्टरपंथी संगठनों से जुड़ते हैं, हथियार और टारगेटिंग की ट्रेनिंग लेते हैं, और वारदात को अंजाम देने के बाद फिर से आम जिंदगी में लौट जाते हैं। इनका कोई पूर्व रिकॉर्ड न होने के कारण, सुरक्षा एजेंसियों के लिए इन्हें पकड़ना बेहद मुश्किल हो जाता है।


टीआरएफ: नाम के पीछे छिपा लश्कर 

एक्सपर्ट्स के मुताबिक The Resistance Front (TRF) आतंकवाद के इस नए मॉडल का प्रमुख चेहरा बनकर उभरा है। यह संगठन लश्कर-ए-तैयबा की शाखा मानी जाती है, जिसे अनुच्छेद 370 हटने के बाद पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI, लश्कर और हिजबुल मुजाहिदीन की मदद से बनाया गया। TRF का मकसद था|  भारत में हो रहे आतंकी हमलों से पाकिस्तान का नाम अलग रखना, ताकि वह FATF की ब्लैकलिस्ट में न फंसे | 


छलावा और साइबर नैरेटिव 

मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो आतंकियों का आतंक फैलाने का तरीका बदल गया है। अब वे खुद को पहचान में नहीं लाते, बल्कि सोशल मीडिया के जरिए 'They vs Us' जैसा नैरेटिव चलाकर कट्टरपंथ को हवा देते हैं। इसमें आतंकी खुद को "शोषित" और देश को "शोषक" के तौर पर पेश करते हैं। भले ही हाइब्रिड मिलिटेंट्स खुद स्मार्टफोन का इस्तेमाल न करें, लेकिन उनके समर्थक ऑनलाइन मौजूद रहते हैं| वीडियो, संदेश और भड़काऊ सामग्री के जरिए युवाओं को उकसाते हैं।


स्थानीय समस्याएं भी बनीं कारण  

विशेषज्ञों का मानना है कि आतंकवाद की जड़ें भले ही सीमा पार से आती हों, लेकिन स्थानीय बेरोजगारी, राजनीतिक अस्थिरता और कट्टर धार्मिक विचारधारा इसे पोषण देती है। कई गुटों का मुख्य कार्य सिर्फ ओवरग्राउंड वर्कर्स को जोड़ना और युवाओं को कट्टरपंथी बनाना रह गया है।


अब भी हर सुबह डर के साए में

केंद्र सरकार और सुरक्षाबल लगातार शांति बहाल करने के प्रयास कर रहे हैं। लेकिन सच यह है कि कश्मीर में आज भी हर सूरज एक नए डर के साए में उगता है।


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