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ईरान-इजरायल युद्ध का भारत पर असर: खाद, सोना और खजूर की सप्लाई पर संकट

पश्चिम एशिया में बढ़ते ईरान-इजरायल तनाव का असर भारत के उर्वरक आयात, सोने की कीमतों और खजूर की सप्लाई पर पड़ सकता है। हॉरमुज़ जलडमरूमध्य बंद होने की स्थिति में किसानों और निर्यातकों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

दिल्ली न्यूज
उर्वरकों पर संकट की आशंका
© सोशल मीडिया
Jitendra Vidyarthi
4 मिनट

DESK: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के चलते भारत के सामने केवल पेट्रोलियम उत्पादों की ही नहीं, बल्कि उर्वरकों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति को लेकर भी गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। यदि ईरान-इजरायल संघर्ष लंबा खिंचता है और खाड़ी क्षेत्र इसके दायरे में आता है, तो इसका सीधा असर भारत के आयात-निर्यात और घरेलू बाजार पर पड़ेगा। यह स्थिति विशेष रूप से किसानों के लिए चिंता का विषय है।


सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के छह देशों के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार लगभग 15.56 लाख करोड़ रुपये रहा। इससे स्पष्ट है कि खाड़ी देश भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदार हैं। ऐसे में क्षेत्रीय अस्थिरता से व्यापार के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर असर पड़ सकता है।


उर्वरकों पर संकट की आशंका

भारत यूरिया और फॉस्फेट जैसे उर्वरकों के कच्चे माल के लिए खाड़ी देशों पर काफी हद तक निर्भर है। विशेष रूप से यूरिया और डीएपी की आपूर्ति में इन देशों की अहम भूमिका है। भारत अपने कुल उर्वरक आयात का लगभग 46 प्रतिशत केवल ओमान से मंगाता है। यदि हॉरमुज़ जलडमरूमध्य बंद होता है, तो उर्वरकों की भारी किल्लत पैदा हो सकती है, जिससे कृषि लागत और खाद्य उत्पादन दोनों प्रभावित होंगे।


सोना और अन्य आयात

भारत संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों से बड़े पैमाने पर सोना आयात करता है। युद्ध की स्थिति में शिपिंग लागत बढ़ सकती है और निवेशकों के सुरक्षित विकल्प के रूप में सोने की मांग भी बढ़ेगी। इससे सोने की कीमतों में तेजी आ सकती है। इसी प्रकार, भारत अपनी कुल खजूर आवश्यकता का लगभग 80-90 प्रतिशत खाड़ी देशों से आयात करता है। साधारण खजूर का सबसे अधिक आयात संयुक्त अरब अमीरात से होता है, जबकि सूखी और ताजी खजूर की बड़ी खेप ओमान से आती है। यदि समुद्री मार्ग बाधित होते हैं, तो खजूर और अन्य प्रोसेस्ड फूड की आपूर्ति प्रभावित होकर महंगी हो सकती है।


सऊदी अरब, इराक, यूएई और ओमान भारत के प्रमुख खाद्यान्न खरीदार हैं। समुद्री मार्ग बाधित होने से निर्यात में देरी और लागत में वृद्धि हो सकती है। भारत के कुल बासमती चावल निर्यात का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी देशों और ईरान को जाता है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने लगभग 60 लाख टन बासमती चावल निर्यात किया, जिसकी कीमत करीब 50,312 करोड़ रुपये रही। खाड़ी देशों में भारतीय मांस और समुद्री उत्पादों, विशेषकर जमी हुई मछली और झींगा, की भी बड़ी मांग है। लॉजिस्टिक बाधाओं के कारण इनका निर्यात प्रभावित हो सकता है।


भारत जेनेरिक दवाओं का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने पर दवा निर्यात राजस्व पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा मशीनरी, ऑटो कंपोनेंट, निर्माण सामग्री, रेडीमेड गारमेंट और टेक्सटाइल निर्यात भी प्रभावित हो सकते हैं। जनवरी में खाड़ी देशों को मशीनरी निर्यात में 16 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी, जबकि परिधान निर्यात का बाजार लगभग 1.79 बिलियन डॉलर का है। शिपिंग लागत बढ़ने से भारतीय निर्यातकों, विशेषकर एमएसएमई क्षेत्र, की प्रतिस्पर्धा क्षमता घट सकती है।


यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा चलता है और समुद्री मार्ग बाधित होते हैं, तो भारत को उर्वरक, पेट्रोलियम, सोना, खजूर और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में बाधा झेलनी पड़ सकती है। साथ ही, निर्यात पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है। इस स्थिति का सबसे बड़ा प्रभाव कृषि, व्यापार और आम उपभोक्ताओं पर दिखाई दे सकता है।

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