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अच्छी नौकरी करने वाली पत्नी को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता, इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला देते हुए कहा कि नियमित और अच्छी आय वाली पत्नी सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है। हाईकोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।

1st Bihar Published by: First Bihar Updated Dec 13, 2025, 9:47:55 PM

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हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश किया रद्द - फ़ोटो सोशल मीडिया

DESK: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि यदि पत्नी अच्छी नौकरी कर रही है और अपने खर्चों के लिए पर्याप्त वेतन प्राप्त कर रही है, तो वह दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है। हाईकोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पति को पत्नी को 5,000 रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था।


यह फैसला न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने गौतम बुद्ध नगर निवासी अंकित साहा की पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। फैमिली कोर्ट ने पत्नी की आय के बावजूद “आय संतुलन और समानता” के आधार पर गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था, जबकि पत्नी हर महीने लगभग 36,000 रुपये वेतन प्राप्त कर रही थी।


हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता तभी दिया जा सकता है, जब पत्नी अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हो। इस मामले में पत्नी स्वयं स्वीकार कर चुकी है कि वह नियमित नौकरी करती है और उसे पर्याप्त मासिक वेतन मिलता है।


कोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी साफ हाथों से न्यायालय के समक्ष नहीं आई। उसने प्रारंभ में खुद को बेरोजगार और अनपढ़ बताया, जबकि रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि वह पोस्ट ग्रेजुएट है और सीनियर सेल्स कोऑर्डिनेटर के पद पर कार्यरत है। याचिकाकर्ता पति का कहना था कि पत्नी ने फैमिली कोर्ट में गलत तथ्य प्रस्तुत किए, जिसे सबूतों ने गलत साबित कर दिया।


हाईकोर्ट ने आगे कहा कि जिस पत्नी पर कोई अतिरिक्त पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं है, उसके लिए 36,000 रुपये प्रतिमाह की आय अपर्याप्त नहीं कही जा सकती। इसके विपरीत, पति पर वृद्ध माता-पिता के भरण-पोषण और अन्य सामाजिक जिम्मेदारियों का भी बोझ होता है। अंत में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 125(1)(ए) के तहत कमाने वाली और आत्मनिर्भर पत्नी अपने पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है। इसी आधार पर फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया गया।