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Success Story: पिता की मौत के बाद भी नहीं टूटा हौसला, पहली ही कोशिश में बिहार की दिव्या बनीं जज

Success Story: बिहार के औरंगाबाद की बेटी ने बीपीएससी द्वारा आयोजित बिहार न्यायिक सेवा (PCS-J) परीक्षा में सफलता प्राप्त कर न्यायिक पद पर चयनित हो गई और अपने पिता का सपना पूरा कर दिया है. जानें...

Success Story
सफलता की कहानी
© GOOGLE
Viveka Nand
3 मिनट

Success Story: बिहार के औरंगाबाद जिले की होनहार बेटी दिव्या कुमारी ने अपने पहले ही प्रयास में प्राप्त बीपीएससी द्वारा आयोजित बिहार न्यायिक सेवा (PCS-J) परीक्षा में सफलता कर न्यायिक पद पर चयनित होकर न सिर्फ अपने परिवार, बल्कि पूरे राज्य का नाम गर्व से ऊँचा कर दिया है।


इस सफलता के पीछे केवल परिश्रम नहीं, बल्कि एक बेटी का अपने दिवंगत पिता के सपने को पूरा करने का दृढ़ संकल्प, मां का मजबूत सहारा, और दिव्या का अटूट आत्मविश्वास भी छिपा है। दिव्या के पिता विजय सिंह का सपना था कि उनकी बेटी एक दिन जज बने। लेकिन वर्ष 2021 में कोरोना महामारी के दौरान उनका असमय निधन हो गया। यह क्षण दिव्या के लिए भावनात्मक रूप से बहुत कठिन था, पर उन्होंने हार मानने की बजाय अपने पिता के अधूरे सपने को अपना जीवन लक्ष्य बना लिया।


दिव्या की प्रारंभिक शिक्षा औरंगाबाद के मिशन स्कूल में हुई। इसके बाद उन्होंने रांची से BALLB की डिग्री हासिल की। स्नातक के बाद उन्होंने दिल्ली में रहकर न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू की। उन्होंने वर्ष 2022 में एक प्रमुख कोचिंग संस्थान से मार्गदर्शन लिया और वर्ष 2023 में आयोजित BPSC PCS-J परीक्षा में अपने पहले ही प्रयास में सफलता प्राप्त की।


दिव्या की तैयारी में सबसे महत्वपूर्ण रहा उनका एक वर्ष का न्यायिक इंटर्नशिप अनुभव, जिससे उन्हें अदालत की कार्यप्रणाली को समझने में मदद मिली और वास्तविक परिदृश्यों को जानने का अवसर मिला। यह अनुभव उनके लिए आत्मविश्वास बढ़ाने और उत्तर लेखन में स्पष्टता लाने का माध्यम बना। जब पिता साथ नहीं थे, तब मां ने हर कदम पर दिव्या का हौसला बढ़ाया। उन्होंने घर की ज़िम्मेदारियों से लेकर भावनात्मक समर्थन तक, हर मोर्चे पर दिव्या को मजबूत बनाए रखा।


दिव्या आज न्यायिक सेवा की तैयारी कर रहे हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। उनका मानना है कि सोशल मीडिया से दूरी बनाना ज़रूरी है, क्योंकि यह फोकस भटकाता है। एलएलबी की पढ़ाई के दौरान ही गंभीर तैयारी शुरू कर दें, जिससे बुनियाद मजबूत हो। हर दिन लक्ष्य के लिए छोटा-छोटा प्रयास करें, ताकि लंबी दूरी का सफर भी आसान लगे।


दिव्या की कहानी यह साबित करती है कि अगर इरादे मजबूत हों और प्रयास लगातार हों, तो विपरीत परिस्थितियाँ भी रास्ता नहीं रोक सकतीं। उन्होंने न सिर्फ अपने पिता का सपना पूरा किया, बल्कि यह भी दिखा दिया कि बेटियाँ किसी से कम नहीं होतीं। वे आज उन सभी बेटियों के लिए मिसाल बन चुकी हैं, जो सीमित संसाधनों और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद अपनी मेहनत और लगन से नए मुकाम हासिल करना चाहती हैं।


दिव्या कुमारी की सफलता यह सिखाती है कि परिस्थिति चाहे जैसी भी हो, सपनों के साथ ईमानदारी और निरंतरता से किया गया प्रयास हमेशा रंग लाता है। वे आज बिहार की बेटियों का गौरव हैं और देशभर की छात्राओं के लिए सशक्त प्रेरणा हैं।

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