ब्रेकिंग
Bihar Police में प्रमोशन! 49 इंस्पेक्टर बने DSP, गृह विभाग ने जारी की अधिसूचना✦BIHAR NEWS : कुशवाहा को विधायकों ने दिखा दी औकात, बार -बार पार्टी से निकालने की डिमांड; पर हिम्मत नहीं जुटा रहे RLM सुप्रीमो✦त्योहारों से पहले पटना की नामी मिठाई दुकानों पर बड़ा एक्शन, कहीं खराब मिठाई-पनीर तो कहीं सफाई व्यवस्था फेल, लाखों का माल जब्त✦नवोदय विद्यालय में प्रार्थना के दौरान अचानक बिगड़ी 4 छात्राओं की तबीयत, चक्कर खाकर गिरीं; अस्पताल में भर्ती✦दुर्गा पूजा पर बिहार में इतने दिन बंद रहेंगे स्कूल, 17 अक्टूबर से छुट्टी, जानिए कब खुलेंगे✦Bihar Police में प्रमोशन! 49 इंस्पेक्टर बने DSP, गृह विभाग ने जारी की अधिसूचना✦BIHAR NEWS : कुशवाहा को विधायकों ने दिखा दी औकात, बार -बार पार्टी से निकालने की डिमांड; पर हिम्मत नहीं जुटा रहे RLM सुप्रीमो✦त्योहारों से पहले पटना की नामी मिठाई दुकानों पर बड़ा एक्शन, कहीं खराब मिठाई-पनीर तो कहीं सफाई व्यवस्था फेल, लाखों का माल जब्त✦नवोदय विद्यालय में प्रार्थना के दौरान अचानक बिगड़ी 4 छात्राओं की तबीयत, चक्कर खाकर गिरीं; अस्पताल में भर्ती✦दुर्गा पूजा पर बिहार में इतने दिन बंद रहेंगे स्कूल, 17 अक्टूबर से छुट्टी, जानिए कब खुलेंगे

Bihar News : नाव ही रास्ता, नाव ही मौत! वैशाली में 13 बच्चों की मौत के बाद सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल

वैशाली के राघोपुर में जर्जर नाव डूबने से 13 बच्चों की मौत ने पूरे बिहार को झकझोर दिया। जिस नाव को पहले ही परित्यक्त घोषित किया गया था, वह दोबारा इस्तेमाल में कैसे आई? हादसे के बाद नावों की सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़े सवाल उठ रहे हैं।

Bihar News : नाव ही रास्ता, नाव ही मौत! वैशाली में 13 बच्चों की मौत के बाद सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल
Tejpratap
Tejpratap
7 मिनट

वैशाली: रात का वक्त था। घरों में बच्चे श्राद्ध का भोज खाने जाने की तैयारी कर रहे थे। किसी ने सोचा भी नहीं था कि कुछ ही देर बाद कई घरों में चूल्हे ठंडे पड़ जाएंगे। राघोपुर के रामपुर श्यामचंद पंचायत के एक टोले से करीब 25 बच्चे पड़ोसी गांव जाने के लिए नाव पर सवार हुए। दोनों गांवों के बीच पानी से भरा करीब 300 मीटर का इलाका था। जमीन का रास्ता बंद था, इसलिए नाव ही सहारा थी। लेकिन जिस नाव पर बच्चे बैठे, वही कुछ दूर जाते ही जिंदगी और मौत के बीच का आखिरी सफर बन गई।

नाव आगे बढ़ी तो पहले डगमगाई। फिर उसमें पानी भरने लगा। देखते ही देखते चीख-पुकार मच गई और नाव पानी में पलट गई। इस दर्दनाक हादसे में 13 बच्चों की मौत हो गई, जबकि कई बच्चे अब भी लापता बताए जा रहे हैं। तीन बच्चों को ग्रामीणों ने किसी तरह बचा लिया। एक ही परिवार की सात बच्चियों की मौत ने पूरे इलाके को हिलाकर रख दिया है। लेकिन हादसे के बाद सिर्फ मातम नहीं है। अब कई ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब मिलना जरूरी है।

सबसे बड़ा सवाल- जिस नाव को परित्यक्त घोषित किया गया था, वह पानी में चल कैसे रही थी?

ग्रामीणों के मुताबिक हादसे वाली नाव कभी सरकारी इस्तेमाल में थी। पुरानी और जर्जर होने के बाद उसे परित्यक्त घोषित यानी "त्यागा हुआ कर दिया गया था। इसके बाद ग्रामीणों ने उसकी मरम्मत कर उसे दोबारा इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। बताया जा रहा है कि नाव में दरार भी थी।

यहीं से सवाल और गंभीर हो जाता है। अगर नाव को पहले ही असुरक्षित मानकर छोड़ दिया गया था, तो फिर वह दोबारा लोगों को ढोने के काम में कैसे आ गई? क्या किसी अधिकारी ने उसकी स्थिति की जांच की? क्या उसकी क्षमता तय थी? क्या यह देखा गया कि नाव कितने लोगों का भार उठा सकती है? इन सवालों के जवाब अब जांच में तलाशे जाने चाहिए।

नाव चली तो कुछ दूर बाद बिगड़ गई स्थिति

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक नाव किनारे से आगे बढ़ी तो सब कुछ सामान्य था। लेकिन पानी के बीच पहुंचने के बाद नाव डगमगाने लगी। नाव में पानी घुसने लगा और कुछ ही देर में हालात बेकाबू हो गए। बच्चों को संभलने का मौका तक नहीं मिला।पानी में गिरते ही चारों तरफ चीख-पुकार मच गई। आसपास मौजूद ग्रामीण मदद के लिए दौड़े और कई लोग अपनी जान की परवाह किए बिना पानी में उतर गए। अंधेरा होने के कारण बचाव अभियान और मुश्किल हो गया। ग्रामीणों ने घंटों मेहनत कर बच्चों को बाहर निकालने की कोशिश की। तीन बच्चों की जान बचाने में ग्रामीणों की भूमिका सबसे अहम रही। लेकिन हर किसी को नहीं बचाया जा सका।

जब एंबुलेंस नहीं पहुंची तो खाट बनी एंबुलेंस

हादसे के बाद व्यवस्था की दूसरी तस्वीर भी सामने आई। ग्रामीणों का आरोप है कि एंबुलेंस समय पर नहीं पहुंच सकी। ऐसे में घायल बच्चों को अस्पताल ले जाने के लिए लोगों ने खाट का सहारा लिया। अंधेरी रात में ग्रामीण बच्चों को खाट पर लेकर अस्पताल की ओर भागते नजर आए।

यह दृश्य सिर्फ एक हादसे की भयावहता नहीं दिखाता, बल्कि ग्रामीण इलाकों में आपातकालीन व्यवस्था की चुनौतियों को भी सामने लाता है। सवाल है कि ऐसे जलभराव वाले इलाकों में आपदा के समय तत्काल मदद पहुंचाने की व्यवस्था कितनी मजबूत है?

जब नाव ही रास्ता है तो उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी?

राघोपुर जैसे इलाकों में नाव कोई शौक नहीं, मजबूरी है। पानी से घिरे गांवों के लोगों को खेत, बाजार, स्कूल, अस्पताल या रिश्तेदारों के घर जाने के लिए कई बार नाव का सहारा लेना पड़ता है। ऐसे में नाव उनके लिए सड़क की तरह है।लेकिन अगर वही नाव जर्जर हो, उसमें दरार हो और उसकी क्षमता से ज्यादा लोग बैठ जाएं, तो वह रास्ता नहीं बल्कि खतरा बन जाती है।

वैशाली हादसे ने इसी व्यवस्था पर सवाल खड़ा किया है। क्या नावों की नियमित जांच होती है? क्या हर नाव का फिटनेस रिकॉर्ड है? क्या नाविकों को सुरक्षा नियमों की जानकारी दी जाती है? क्या यात्रियों की संख्या तय होती है? और सबसे अहम, क्या लोगों को लाइफ जैकेट उपलब्ध कराई जाती है?अगर इन सवालों के जवाब व्यवस्था के पास नहीं हैं, तो यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक बड़ी चेतावनी है।

मुआवजा मिला, लेकिन क्या जवाबदेही भी तय होगी?

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हादसे पर दुख जताते हुए मृतकों के परिजनों को चार-चार लाख रुपये अनुग्रह राशि देने की घोषणा की है। तेजस्वी यादव ने भी राहत और बचाव अभियान तेज करने के लिए अधिकारियों को निर्देश दिए हैं।मुआवजा संकट की घड़ी में परिवारों को आर्थिक सहारा जरूर देगा, लेकिन जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को खोया है, उनके लिए इस नुकसान की भरपाई किसी रकम से संभव नहीं है।अब जरूरत सिर्फ राहत की नहीं, जवाबदेही की भी है।

जांच में यह साफ होना चाहिए कि नाव की वास्तविक स्थिति क्या थी, उसे परित्यक्त घोषित किए जाने के बावजूद उसका इस्तेमाल कैसे हो रहा था, उसमें कितने लोग सवार थे और क्या प्रशासन को इसकी जानकारी थी। अगर किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

अब सवाल सिर्फ 13 मौतों का नहीं, अगली जिंदगी बचाने का है

वैशाली की यह घटना उन सभी इलाकों के लिए चेतावनी है, जहां नाव लोगों के लिए रोजमर्रा के सफर का एकमात्र सहारा है। जर्जर नावों को हटाना, नियमित फिटनेस जांच कराना, क्षमता के मुताबिक यात्रियों को बैठाना, लाइफ जैकेट उपलब्ध कराना और आपातकालीन बचाव की व्यवस्था मजबूत करना अब जरूरी है। क्योंकि राघोपुर में 13 बच्चों की मौत के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर किसी गांव का रास्ता नाव है, तो उस नाव से सुरक्षित घर लौटने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?