पटना: बिहार की राजनीति में राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के सामने अब सिर्फ पार्टी में अनुशासन बनाए रखने की चुनौती नहीं है, बल्कि विधायकों की संख्या, दल-बदल कानून और सत्ता में अपनी राजनीतिक हैसियत बचाने का सवाल भी खड़ा हो गया है। सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से एनडीए के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरे राम पुकार सिन्हा को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित करने के बाद कुशवाहा ने सख्त संदेश देने की कोशिश की। लेकिन इस फैसले के बीच उनके तीन विधायक ही अलग राह पर खड़े नजर आ रहे हैं। माधव आनंद, रामेश्वर महतो, और आलोक कुमार सिंह ने राम पुकार सिन्हा का समर्थन किया था। अब सवाल है कि पार्टी प्रमुख इन विधायकों के खिलाफ भी कार्रवाई करेंगे या फिर दल-बदल कानून और विधानसभा के संख्या गणित को देखते हुए सियासी समझौते का रास्ता चुनेंगे?
चार विधायक, तीन नाराज; कुशवाहा के सामने सबसे बड़ी चुनौती
RLM के पास बिहार विधानसभा में कुल चार विधायक हैं। इनमें से तीन विधायकों की नाराजगी ने पार्टी नेतृत्व के सामने असहज स्थिति पैदा कर दी है। अगर कुशवाहा इन विधायकों पर कार्रवाई करते हैं, तो पार्टी की विधायी ताकत प्रभावित हो सकती है। वहीं, कार्रवाई नहीं करने पर यह सवाल उठेगा कि क्या पार्टी में अनुशासन का नियम सभी के लिए एक जैसा है? यही वजह है कि यह विवाद अब केवल निष्कासन तक सीमित नहीं रह गया है। इसके केंद्र में यह सवाल है कि क्या किसी छोटे सहयोगी दल का नेतृत्व अपने विधायकों के विरोध के बावजूद संगठन पर अपनी पकड़ कायम रख सकता है?
दल-बदल कानून क्या कहता है?
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में दल-बदल के आधार पर विधायकों की अयोग्यता के प्रावधान हैं। इसके तहत यदि कोई विधायक स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है या सदन में पार्टी के निर्देश के विरुद्ध मतदान करता है अथवा मतदान से अनुपस्थित रहता है और उसे नियमों के अनुसार छूट नहीं मिलती, तो उसकी सदस्यता पर खतरा पैदा हो सकता है। हालांकि, किसी विधायक का पार्टी नेतृत्व से असहमत होना या किसी राजनीतिक कार्यक्रम में शामिल होना अपने आप में सदस्यता खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है। मामले के वास्तविक तथ्यों और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर निर्णय लिया जाता है।
यानी RLM के तीनों विधायक अगर कुशवाहा के फैसले का विरोध कर रहे हैं, तो केवल इस आधार पर उनकी विधानसभा सदस्यता खत्म नहीं हो जाएगी। पार्टी के भीतर मतभेद और सदन में दल के निर्देश के विरुद्ध मतदान करना दो अलग-अलग स्थितियां हैं। ऐसे में कुशवाहा के सामने पार्टी अनुशासन और संवैधानिक प्रक्रिया के बीच अंतर समझते हुए फैसला लेने की चुनौती है।
क्या तीन विधायक मिलकर दूसरी पार्टी में जा सकते हैं?
यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम कानूनी पहलू है। दल-बदल कानून में किसी विधायक के लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि वह पार्टी के एक तिहाई या तीन-चौथाई विधायकों के साथ अलग हो रहा है। वर्ष 2003 में संविधान के 91वें संशोधन के बाद पुराने एक-तिहाई सदस्यों वाले विभाजन के अपवाद को समाप्त कर दिया गया था।
मौजूदा प्रावधानों के तहत राजनीतिक दल के विलय से जुड़ी छूट के लिए संबंधित विधायक दल के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्यों की सहमति आवश्यक है। चार विधायकों वाली RLM के मामले में दो-तिहाई की सीमा पूरी करने के लिए कम-से-कम तीन विधायकों का समर्थन जरूरी होगा। लेकिन सिर्फ तीन विधायकों के एक साथ किसी दूसरे दल में जाने की घोषणा कर देने से ही कानूनी सुरक्षा स्वतः नहीं मिल जाती। राजनीतिक दल के विलय और संविधान की दसवीं अनुसूची की अन्य शर्तों को भी पूरा करना होगा। इसका मतलब यह है कि RLM के तीन नाराज विधायकों का एक साथ होना राजनीतिक रूप से कुशवाहा के लिए बड़ी चुनौती जरूर है, लेकिन इससे उनकी सदस्यता और पार्टी के भविष्य को लेकर अपने आप कोई अंतिम कानूनी निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
कुशवाहा के सामने कार्रवाई का जोखिम
कुशवाहा यदि तीनों विधायकों को पार्टी से निकालने का फैसला करते हैं, तो इससे संगठन के भीतर टकराव और बढ़ सकता है। हालांकि, पार्टी से निष्कासन और विधानसभा की सदस्यता से अयोग्यता अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। केवल पार्टी से निष्कासित कर देने भर से किसी विधायक की विधानसभा सदस्यता अपने आप समाप्त नहीं होती।
दूसरी ओर, अगर विधायक पार्टी छोड़ने या किसी दूसरे दल में शामिल होने का रास्ता चुनते हैं, तो दल-बदल कानून के तहत संबंधित परिस्थितियों की जांच हो सकती है। अयोग्यता के सवाल पर फैसला संबंधित सदन के सक्षम प्राधिकारी को संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार करना होता है। इसलिए यह कहना भी जल्दबाजी होगी कि तीन विधायकों के अलग होते ही RLM का अस्तित्व खत्म हो जाएगा।
फिर भी राजनीतिक स्तर पर कुशवाहा के लिए खतरा वास्तविक है। चार में से तीन विधायकों का विरोध पार्टी नेतृत्व की ताकत पर सवाल खड़ा करता है। एनडीए में सहयोगी दल के रूप में अपनी भूमिका बनाए रखने के लिए उन्हें यह भी दिखाना होगा कि पार्टी के भीतर लिए गए फैसलों को लागू कराने की क्षमता उनके पास है।
बेटे की मंत्री पद वाली कुर्सी पर भी चर्चा
उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश बिहार सरकार में मंत्री हैं और विधान परिषद के सदस्य भी हैं। ऐसे में RLM के विधायी समीकरणों में किसी बड़े बदलाव को लेकर परिवार की राजनीतिक भूमिका पर भी चर्चा होना स्वाभाविक है। हालांकि, विधायकों के विरोध, पार्टी से निष्कासन या दल-बदल विवाद के कारण मंत्री पद अपने आप समाप्त नहीं होता। मंत्री पद पर बने रहने का सवाल संबंधित संवैधानिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।इसलिए पूरे घटनाक्रम को सीधे मंत्री पद जाने से जोड़ना सही नहीं होगा। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल RLM के भीतर नेतृत्व की पकड़ और एनडीए के साथ तालमेल का है।
अब कुशवाहा क्या करेंगे?
सारण शिक्षक सीट पर राम पुकार सिन्हा के खिलाफ कार्रवाई के बाद निगाहें अब उन तीन विधायकों पर टिकी हैं, जिन्होंने उनका समर्थन किया था। कुशवाहा के सामने दो रास्ते दिखाई देते हैं—या तो बातचीत के जरिए नाराज विधायकों को मनाकर विवाद खत्म करें, या अनुशासन के नाम पर आगे भी सख्त कदम उठाएं।लेकिन इस पूरे विवाद ने एक बात साफ कर दी है कि छोटे दलों की राजनीति में संख्या बल कितना अहम होता है। उपेंद्र कुशवाहा के लिए चुनौती सिर्फ बागी तेवरों को शांत करने की नहीं, बल्कि दल-बदल कानून की संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहते हुए पार्टी की एकजुटता बनाए रखने की भी है। अब देखना यह है कि कुशवाहा अपनी पार्टी में अनुशासन कायम रखने के लिए सख्त कदम उठाते हैं या तीन विधायकों के विरोध के बीच समझौते का रास्ता अपनाते हैं।
फिलहाल RLM के घटनाक्रम ने उपेंद्र कुशवाहा को ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां उनके सामने हर रास्ते में राजनीतिक जोखिम दिखाई देता है। कार्रवाई करते हैं तो पार्टी के भीतर विरोध और बढ़ सकता है, नहीं करते हैं तो नेतृत्व की सख्ती पर सवाल उठेंगे। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि कुशवाहा इस संकट से निकलने के लिए कौन-सा रास्ता चुनते हैं। कुल मिलाकर, RLM की लड़ाई अब सिर्फ विधान परिषद चुनाव की नहीं रह गई है। यह उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व, पार्टी पर उनकी पकड़ और एनडीए के भीतर उनकी राजनीतिक हैसियत की भी परीक्षा बन गई है। अब देखने वाली बात यह होगी कि कुशवाहा अपने विधायकों को मनाकर संकट टालते हैं या फिर पार्टी के भीतर जारी यह टकराव आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति का नया विवाद बनता है।





