Bihar Teacher : बिहार के नालंदा जिले में नियोजित शिक्षकों के शैक्षणिक प्रमाणपत्रों की जांच के दौरान एक बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ है। पटना हाईकोर्ट के निर्देश पर चल रही जांच में पांच शिक्षकों के दस्तावेज संदिग्ध पाए गए हैं, जिसके बाद निगरानी विभाग की शिकायत पर संबंधित थानों में अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज की गई है। आरोप है कि इन शिक्षकों ने फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल की थी।
जानकारी के अनुसार, सबसे पहले हिलसा प्रखंड की एक शिक्षिका के खिलाफ कार्रवाई की गई। पचरुखिया उत्क्रमित मध्य विद्यालय में कार्यरत शिक्षिका शारदा रानी ने नियुक्ति के समय वर्ष 2013 में उत्कल विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर से जारी बीएड प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया था। निगरानी विभाग द्वारा दस्तावेजों की जांच के लिए विश्वविद्यालय से संपर्क किया गया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने रिकॉर्ड मिलान के बाद संबंधित प्रमाणपत्र को फर्जी करार दिया। इसके बाद हिलसा थाना में उनके खिलाफ कांड संख्या 447/2026 दर्ज किया गया।
जांच के दौरान केवल एक ही मामला सामने नहीं आया, बल्कि चार अन्य शिक्षकों के दस्तावेज भी संदिग्ध पाए गए। राजगीर प्रखंड के अंडवस मध्य विद्यालय में कार्यरत मो. जाहिद परवेज के खिलाफ राजगीर थाना में कांड संख्या 362/2026 दर्ज किया गया है। वहीं सिलाव प्रखंड के धामर उत्क्रमित मध्य विद्यालय के शिक्षक सुबोध कुमार, पचवारा उत्क्रमित मध्य विद्यालय के नीरज कुमार तथा नानंद मध्य विद्यालय के मणि शंकर शर्मा के खिलाफ भी सिलाव थाना में अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज की गई है।
निगरानी विभाग की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि इन शिक्षकों द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रमाणपत्र संबंधित विश्वविद्यालयों के रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते हैं। दस्तावेजों की सत्यता पर सवाल उठने के बाद अब पुलिस और विभागीय स्तर पर विस्तृत जांच शुरू कर दी गई है।
सूत्रों के अनुसार, नालंदा जिले में फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी करने वाले शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई का दायरा लगातार बढ़ रहा है। अब तक जिले में करीब 80 नियोजित शिक्षकों के खिलाफ विभिन्न थानों में मामले दर्ज किए जा चुके हैं। यह आंकड़ा शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन दोनों के लिए चिंता का विषय बन गया है।
राजगीर अनुमंडल के डीएसपी संजित कुमार गुप्ता ने बताया कि सभी मामलों में विधिसम्मत कार्रवाई की जा रही है। पुलिस का मुख्य फोकस केवल आरोपित शिक्षकों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन गिरोहों और बिचौलियों की पहचान भी की जा रही है जो फर्जी प्रमाणपत्र तैयार करने और उन्हें सरकारी नौकरियों में इस्तेमाल कराने का काम करते हैं। जांच एजेंसियां इस नेटवर्क की तह तक पहुंचने का प्रयास कर रही हैं।
डीएसपी ने बताया कि संबंधित विभागों को भी सूचना भेज दी गई है ताकि आरोपित शिक्षकों की सेवा समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू की जा सके। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ विभागीय कार्रवाई भी की जाएगी।
इस पूरे मामले ने बिहार की शिक्षक नियुक्ति प्रक्रिया और शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हाईकोर्ट के आदेश के बाद चल रही जांच में अभी और भी कई मामलों के सामने आने की संभावना जताई जा रही है। प्रशासन ने जिले के अन्य नियोजित शिक्षकों के दस्तावेजों की जांच प्रक्रिया को तेज कर दिया है।
शिक्षा विभाग और निगरानी विभाग का कहना है कि फर्जी प्रमाणपत्रों के सहारे सरकारी नौकरी पाने वालों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। साथ ही ऐसे प्रमाणपत्र तैयार करने वाले गिरोहों पर भी कड़ी कार्रवाई की जाएगी। अधिकारियों का मानना है कि यह अभियान शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।



