Bihar University : बिहार विधानसभा के मानसून सत्र में राज्य सरकार उच्च शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। 20 जुलाई से शुरू होने वाले सत्र में 'बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-2026' पेश किया जाएगा। यदि यह विधेयक विधानसभा और विधान परिषद से पारित होकर राज्यपाल की मंजूरी प्राप्त कर लेता है, तो राज्य के 481 सरकारी डिग्री कॉलेजों का प्रशासनिक नियंत्रण विश्वविद्यालयों से हटाकर सीधे उच्च शिक्षा विभाग के अधीन कर दिया जाएगा।
यह प्रस्ताव बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था में पिछले कई दशकों का सबसे बड़ा प्रशासनिक बदलाव माना जा रहा है। सरकार का कहना है कि इससे कॉलेजों की जवाबदेही बढ़ेगी, शिक्षा व्यवस्था में सुधार होगा और प्रशासनिक फैसले तेजी से लिए जा सकेंगे।
विश्वविद्यालयों की भूमिका में होगा बड़ा बदलाव
फिलहाल बिहार के सरकारी डिग्री कॉलेज संबंधित विश्वविद्यालयों के अधीन संचालित होते हैं। विश्वविद्यालय ही इन कॉलेजों के प्रशासन, शिक्षकों के स्थानांतरण, पदोन्नति और कई अन्य मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नए कानून के लागू होने के बाद यह व्यवस्था बदल जाएगी। डिग्री कॉलेज सीधे उच्च शिक्षा विभाग के नियंत्रण में आ जाएंगे, जबकि विश्वविद्यालयों की भूमिका मुख्य रूप से स्नातकोत्तर (PG) शिक्षा, शोध कार्य और उच्च अकादमिक गतिविधियों तक सीमित रह जाएगी। इसके साथ ही बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-1976 और पटना विश्वविद्यालय अधिनियम-1976 की जगह नया कानून प्रभावी होगा।
सरकार क्यों कर रही है बदलाव?
सरकार का मानना है कि वर्षों से कॉलेजों की शिक्षा व्यवस्था लगातार सवालों के घेरे में रही है। कई कॉलेजों में नियमित पढ़ाई नहीं हो रही, छात्र उपस्थिति कम है और शैक्षणिक गुणवत्ता पर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं। दूसरी ओर सरकार वेतन और अन्य वित्तीय खर्च वहन करने के बावजूद कॉलेजों के संचालन पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं रख पाती है, क्योंकि प्रशासनिक अधिकार विश्वविद्यालयों और कुलाधिपति के दायरे में रहते हैं। सरकार का तर्क है कि यदि कॉलेज सीधे उच्च शिक्षा विभाग के अधीन होंगे तो नियुक्ति, स्थानांतरण, निगरानी और जवाबदेही की प्रक्रिया अधिक प्रभावी होगी तथा शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाना आसान होगा।
शिक्षकों की सेवा शर्तों में भी आएंगे बदलाव
विधेयक लागू होने के बाद सरकारी डिग्री कॉलेजों के शिक्षकों की नियुक्ति, ट्रांसफर, प्रमोशन और अन्य सेवा संबंधी फैसले विश्वविद्यालयों की बजाय उच्च शिक्षा विभाग करेगा। इस बदलाव के बाद कॉलेजों के शिक्षक राज्य सरकार के अन्य कर्मचारियों की तरह माने जाएंगे। इससे उनकी सेवा शर्तों में भी परिवर्तन देखने को मिल सकता है। सरकार असिस्टेंट प्रोफेसरों की नियुक्ति प्रक्रिया में भी संशोधन की तैयारी कर रही है। प्रस्ताव के अनुसार भविष्य में नेट और पीजी डिग्री को न्यूनतम योग्यता बनाया जा सकता है, जबकि पीएचडी को अनिवार्य योग्यता से हटाने पर विचार किया जा रहा है।
हर जिले में होगी निगरानी
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत प्रत्येक जिले में एक उच्च शिक्षा पदाधिकारी नियुक्त करने की योजना है। यह अधिकारी जिले के सभी सरकारी डिग्री कॉलेजों की पढ़ाई, प्रशासनिक व्यवस्था, शिक्षकों की उपस्थिति और अन्य गतिविधियों की नियमित निगरानी करेगा। सरकार का मानना है कि जिला स्तर पर निगरानी मजबूत होने से कॉलेजों की कार्यप्रणाली में सुधार आएगा और छात्रों को बेहतर शैक्षणिक माहौल मिलेगा।
विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर भी छिड़ी बहस
प्रस्तावित कानून को लेकर राजनीतिक और शैक्षणिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। कई विधान परिषद सदस्यों ने सरकार के समक्ष अपनी चिंताएं दर्ज कराई हैं। उनका कहना है कि उच्च शिक्षा व्यवस्था में इतने बड़े बदलाव से पहले विश्वविद्यालयों, शिक्षकों, छात्र संगठनों और अन्य संबंधित पक्षों से व्यापक विचार-विमर्श किया जाना चाहिए। विरोध जताने वाले सदस्यों का मानना है कि विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक संरचना में बदलाव का प्रभाव लंबे समय तक राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है। इसलिए इस विषय पर सभी पक्षों की राय लेना आवश्यक है।
481 सरकारी कॉलेजों पर पड़ेगा सीधा असर
राज्य में संचालित 481 सरकारी डिग्री कॉलेज इस नए कानून से सीधे प्रभावित होंगे। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि विश्वविद्यालयों की व्यवस्था समाप्त नहीं की जा रही है। केवल स्नातक स्तर के सरकारी कॉलेजों के प्रशासनिक संचालन को विश्वविद्यालयों से अलग कर उच्च शिक्षा विभाग के अधीन लाया जा रहा है। विश्वविद्यालय पहले की तरह पीजी शिक्षा, शोध, अकादमिक गतिविधियों और अन्य उच्च शिक्षण कार्यों का संचालन करते रहेंगे।
विधानसभा सत्र पर रहेंगी निगाहें
अब सभी की नजरें 20 जुलाई से शुरू हो रहे बिहार विधानसभा के मानसून सत्र पर टिकी हैं। यदि यह विधेयक सदन से पारित हो जाता है तो बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था का ढांचा पूरी तरह बदल जाएगा। इसका प्रभाव शिक्षकों की नियुक्ति, कॉलेजों के संचालन, प्रशासनिक व्यवस्था और विद्यार्थियों की पढ़ाई तक देखने को मिल सकता है। आने वाले दिनों में इस विधेयक पर सदन के भीतर व्यापक चर्चा होने की संभावना है।




