Dharati Pakad Nagarmal Bajoria: भागलपुर के एमपी द्विवेदी मार्ग निवासी और चुनावी राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने वाले नागरमल बाजोरिया उर्फ ‘धरती पकड़’ का 96 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने राजधानी पटना में अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से वृद्धावस्था संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे।
नागरमल बाजोरिया चुनावी राजनीति में हार-जीत की परवाह किए बिना लगातार मैदान में उतरने के लिए जाने जाते थे। पंचायत से लेकर विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा और राष्ट्रपति पद तक के चुनाव में उन्होंने नामांकन दाखिल किया। वर्ष 2020 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वे अपने जीवनकाल में 281 से अधिक चुनाव लड़ चुके थे।
इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के खिलाफ भी लड़ा चुनाव
नागरमल बाजोरिया ने कई बड़े नेताओं के खिलाफ निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा था। उन्होंने उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और अमेठी से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के खिलाफ चुनावी मैदान में ताल ठोकी थी। वर्ष 2012 में जब प्रणब मुखर्जी यूपीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार थे, तब बाजोरिया ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए भी अपना नामांकन दाखिल किया था।
हालांकि चुनावी आंकड़ों में उन्हें कभी जीत नहीं मिली, लेकिन लोकतंत्र के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और बार-बार चुनावी मैदान में उतरने का जज्बा उन्हें अलग पहचान दिलाता रहा। प्रतिद्वंद्वी उन्हें हराते रहे, लेकिन चुनाव लड़ने का उनका हौसला कभी कम नहीं हुआ।
जनसेवा के कारण मिला ‘धरती पकड़’ नाम
नागरमल बाजोरिया का जुड़ाव केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं था। भागलपुर शहर में गंभीर पेयजल संकट के दौरान उन्होंने अपने निजी खर्च से कई सार्वजनिक स्थानों पर नलकूप (चापाकल) लगवाए थे।जमीन से पानी निकालने की इस पहल और आम लोगों से उनके जुड़ाव के कारण शहरवासियों ने उन्हें सम्मानपूर्वक ‘धरती पकड़’ कहना शुरू किया। यही नाम बाद में उनकी स्थायी पहचान बन गया।
शुक्रवार को होगा अंतिम संस्कार
नागरमल बाजोरिया का पार्थिव शरीर पटना से भागलपुर स्थित उनके एमपी डी रोड आवास लाया जा रहा है। शुक्रवार सुबह 8 बजे उनके निज निवास से अंतिम यात्रा निकलेगी। इसके बाद बरारी घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
उनके निधन से परिवार, शुभचिंतकों और व्यावसायिक जगत में शोक की लहर है। चुनावी जीत भले ही उनके खाते में कभी नहीं आई, लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लगातार भागीदारी, व्यवस्था को चुनौती देने का साहस और कभी हार न मानने का उनका अंदाज भागलपुर की स्मृतियों में लंबे समय तक जीवित रहेगा।



