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नीतीश कुमार की बातों पर यकीन करेंगे तो भूखे मर जायेंगे इसलिए वापस लौट रहे हैं, सुनिये बिहार के प्रवासी मजदूरों की व्यथा

11-Jun-2020 07:11 AM

RANCHI : बुधवार की शाम गढ़वा जिले में झारखंड और छत्तीसगढ के बार्डर पर मजदूरों से भरी बस रूकती है. कोरोना को लेकर सतर्क पुलिस बस में सवार लोगों से पूछताछ करती है. बस में बैठे लोग बताते हैं कि वे बिहार के मुजफ्फरपुर से छत्तीसगढ के रायपुर स्टील प्लांट में काम करने वापस लौट रहे हैं. बार्डर पर तैनात छत्तीसगढ़ के पुलिसकर्मियों को थोड़ी हैरानी होती है, आखिरकार कोराना संकट के इस दौर में लोग वापस क्यों लौट रहे हैं. लेकिन शायद उपर से भी मजदूरों के लौटने की खबर थी लिहाजा उन्हें वापस छत्तीसगढ़ में लौटने की छूट दे दी जाती है. पिछले चार दिनों में बिहार के मजदूरों से भरी कई बसें छत्तीसगढ आ चुकी हैं. 



FIRST BIHAR के संवाददाता ने मजदूरों से बात की तो सीधा जवाब मिला. अगर काम न मिले, घर में खाने का कुछ न हो, बच्चों संग परिवार भूखे सोता हो तो... मजदूर कुछ देर के लिए चुप हो गये. फिर साहस बटोरा और बोलना शुरू किया....नीतीश बाबू के वादे पर बहुत भरोसा किया था. लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ. अपने घर में खाने के लिए अनाज जुटाना असंभव हो गया. अब बाहर जाकर काम करने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं बचा है. बिहार में रहेंगे तो भूखे मरेंगे.  बाहर निकलें तो कोरोना का खतरा. लेकिन भूखे मरने से बेहतर है कोरोना का खतरा उठाना. कोरोना संक्रमण का खतरा उठाकर परिवार चलाने का विकल्प ही हमलोगों ने चुना है. अब जो होगा सो होगा. बिहार के मुजफ्फरपुर से छत्तीसगढ़ के रायपुर स्थित स्टील प्लांट लौट रहे मजदूरों ने अपनी मजबूरी बतायी.  बुधवार को आधा दर्जन बसों से मजदूर काम पर लौट गए.

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नीतीश के वादे पर भरोरा कर फंस गये

छत्तीसगढ लौट रहे मजदूरों ने बिहार सरकार की कहानी सुनायी.मुजफ्फरपुर के देवेंद्र रजक ने कहा नीतीश बाबू कह रहे थे कि बिहार लौटने वाले सब मजदूर को काम देंगे. हमलोग भरोसा करके चले आये. घर लौट कर पता चला कि खाना नहीं जुटेगा. कोई रास्ता नहीं बचा इसलिए वापस लौट रहे हैं.

ये वही मजदूर हैं जो लॉकडाउन के दौरान जान बचाने के लिए पैदल घर भागकर आए थे, अब भूख से जान बचाने के लिए संक्रमण के खतरे के दौरान ही काम पर जा रहे हैं. मजदूरों ने बताया कि महाराष्ट्र, पुणे, रायगढ़, दिल्ली से पैदल तो कभी ट्रक पर सवार होकर लौटे थे. गांव घर में कोई काम नहीं मिला. सरकार कोई रोजगार नहीं दे रही है. सिर्फ जुबानी बात हो रही है. थक हारकर मजदूर वहीं लौट रहे हैं, जहां से संक्रमण के डर से जान बचाकर भागे थे. मुजफ्फरपुर सहित बिहार के अन्य हिस्सों से आधा दर्जन बसों में करीब 200 मजदूर बगैर रोक-टोक छत्तीसगढ लौटे हैं. उनमें 100 से अधिक की संख्या में मजदूर छत्तीसगढ़ के रायपुर स्थित स्टील प्लांट में काम करने लौटे हैं. 

झारखंड छत्तीसगढ़ सीमा पर एनएच 343 से लौट रहे मजदूरों ने गोदरमाना में आपबीती सुनाई. उन्होंने कहा कि वे बिहार के मुजफ्फरपुर के अगल-अलग जगहों के रहने वाले हैं. उनमें कुछ लोग लॉकडाउन से पहले तो अधिसंख्य लॉकडाउन के बाद काम बंद होने पर लौटे थे.

बिहार सरकार सिर्फ झूठ बोलती है


बिहार के कई मजदूर दूसरे राज्यों में भी लौटै हैं. महाराष्ट्र के हॉटस्पॉट पुणे में  काम करने के लिए वापस लौट रहे बिहार के संतोष प्रसाद और देवेंद्र कुमार ने  बताया कि सरकार ने कहा था कि मनरेगा के तहत काम मिलेगा. लेकिन कहीं काम नहीं मिला. घर पर बेकार बैठे थे और परिवार भूखे मरने की हालत में आ गया. मनरेगा में मिट्टी काटने का काम तक नहीं मिला. मनरेगा में भी काम मिल जाता तो बिहार छोड कर नहीं जाते . हम लोग रोज कमाने खाने वाले आदमी हैं. मजदूरी नहीं मिली तो कई दिन परिवार को भूखे रहना पड़ा. जब बर्दाश्त नहीं हुआ तो सोचा परिवार सहित भूखे मरने से अच्छा है खतरा मोल लेना.

छत्तीसगढ के रायपुर स्टील प्लांट लौट रहे रामू राय और प्रदीप कुमार ने बताया कि वह वहीं काम करते थे. नीतीश बाबू की बात मोबाइल पर सुना था इसलिए गांव लौट गये. लगा था कि नीतीश बाबू काम देंगे. लेकिन गांव घर में काम नहीं मिला. इसी बीच स्टील कंपनी की ओर से उन्हें बुलाया गया. कंपनी ने बस भी भेज दिया. इसलिए कंपनी की बस से लौट रहे हैं.  वहां हर दिन 300 से 600 रुपये की मजदूरी मिलती है. उससे परिवार चल जाता है. लॉकडाउन में बेरोजगार होकर घर में बैठ गए थे. दो वक्त की रोजी-रोटी के लिए सोचना पड़ रहा था. बिहार में रहने से बेहतर अब बाहर निकलना ही ठीक समझा सो हम निकल लिए. हमारे रिपोर्टर ने सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि वे नीतीश बाबू का कोई एलान नहीं जानते और ना ही 'पैकेज वैकेज' नहीं जानते. वे तो बस इतना जानते हैं कि भूखे मर रहे थे और इतने दिनों में सरकार काम नहीं दे पायी.