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14-Jan-2024 07:49 AM
By First Bihar
DESK : विपक्षी दलों की गठबंधन यानी इंडिया की शनिवार को वर्चुअल मीटिंग हुई। इस अहम बैठक में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को संयोजक बनाए जाने का प्रस्ताव पेश किया गया। जिसे जेडीयू के अध्यक्ष और बिहार के सीएम ने अस्वीकार कर दिया। इसके बाद यह सवाल उठने लगा कि आखिर नीतीश कुमार ने ऐसा क्यों किया है? ऐसे में अब इन तमाम सवालों का जवाब इस मीटिंग में शामिल हुए एक बड़े नेता ने साफ-साफ शब्दों में दे दिया है। उन्होंने यह भी बता दिया है कि इस मीटिंग के अंदर किन चीजों पर सहमति बनी और आखिर क्यों संयोजक को लेकर नीतीश कुमार ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
दरअसल, इंडिया की शनिवार को हुई वर्चुअल मीटिंग में शामिल हुए एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि- संयोजक पद पर इंडिया में कोई विवाद नहीं है। हमें इसको लेकर कोई चेहरा पेश करने की जरूरत ही नहीं है।
राकांपा अध्यक्ष ने कहा कि -आगामी लोकसभा चुनाव के लिए कोई चेहरा पेश करने की जरूरत ही नहीं है क्योंकि परिणाम घोषित होने के बाद कैंडिडेट का चुनाव किया जाता है। उन्होंने कहा कि नेताओं की डिजिटल बैठक के दौरान संयोजक पद के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम सुझाया गया।
इसके बाद बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने इस मीटिंग में कहा कि -इस गठबंधन में शामिल सभी पार्टी प्रमुखों की एक टीम बनाई जानी चाहिए और संयोजक नियुक्त करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। डिजिटल बैठक के दौरान इंडिया के नेताओं ने गठबंधन के विभिन्न पहलुओं और अप्रैल में में होने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारी पर चर्चा किया। इस दौरान सीट बंटवारे को लेकर कोई बातचीत फिलहाल नहीं की गई है।
शरद पवार ने कहा कि, इस मीटिंग में कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि गठबंधन का नेतृत्व मल्लिकार्जुन खरगे को करना चाहिए। इस पर सभी सहमत हुए।हमने आने वाले दिनों में योजना बनाने के लिए एक समिति भी बनाई। सभी ने सुझाव दिया कि नीतीश कुमार को संयोजक के रूप में जिम्मेदारी लेनी चाहिए, लेकिन उनकी राय है कि जो पहले से ही प्रभारी है, उसे बने रहना चाहिए। चुनाव के बाद अगर हमें बहुमत मिलता है तो हम देश को बेहतर विकल्प दे पाएंगे।
उधर, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के अध्यक्ष ने कहा, 'वोट मांगने के लिए किसी चेहरे को आगे करने की जरूरत नहीं ह। हम चुनाव के बाद नेता का चयन करेंगे और हमें विकल्प उपलब्ध कराने का भरोसा है। 1977 में मोरारजी देसाई को विपक्ष द्वारा प्रधानमंत्री पद के चेहरे के रूप में पेश नहीं किया गया था। उन्होंने कहा कि यह एक सकारात्मक संकेत है कि कई दल एक साथ आ रहे हैं।