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07-Sep-2021 07:34 PM
PATNA: उपेंद्र कुशवाहा, अशोक चौधरी, जनक राम, देवेश कुमार समेत बिहार के 12 एमएलसी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। बिहार में राज्यपाल कोटे से मनोनीत किए गए 12 विधान पार्षदों के मनोनयन को चुनौती देने वाली याचिका पर आज पटना हाईकोर्ट ने सुनवाई की।
वरीय अधिवक्ता बसंत चौधरी की याचिका पर मुख्य न्यायाधीश संजय करोल एवं न्यायाधीश एस कुमार की खंडपीठ ने इस मामले पर सुनवाई की। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि मनोनीत किए गए विधान पार्षद को राजनीतिज्ञों को समाजसेवी माना जाए या नहीं? इस मामले पर अगली सुनवाई 13 सितंबर को होगी।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता बसंत चौधरी ने बताया कि इस तरह के मामले में भारत के संविधान के प्रावधानों के तहत सामाजिक कार्यकर्ता, कलाकार, वैज्ञानिक, साहित्यकार व सहकारिता आंदोलन से जुड़े हुए विशिष्ट लोगों का मनोनयन हो सकता है। सामाजिक कार्यकर्ता को काम का अनुभव, व्यवहारिक ज्ञान और विशिष्ट होना चाहिए। लेकिन इन सब बातों को अनदेखा किया गया है।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता बसंत चौधरी ने कोर्ट को बताया कि मनोनीत किए गए सदस्यों में कोई पार्टी का अधिकारी है। तो कोई अध्यक्ष। जिन लोगों को मनोनीत किया गया है वे न तो साहित्य से जुड़े हैं नही वैज्ञानिक है और ना ही कलाकार। ऐसे में यह संविधान के प्रविधानों का उल्लंघन है। सभी मापदंडों को अनदेखा करते हुए यह फैसला लिया गया है। पटना हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के महाधिवक्ता से पिछ्ली सुनवाई में यह पूछा था कि क्या मनोनीत किए गए एमएलसी में कोई राज्य के मंत्री पद पर है?
विधान पार्षद के रूप में जदयू नेता अशोक चौधरी, JDU संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा, जनक राम, निवेदिता सिंह, घनश्याम ठाकुर, देवेश कुमार, प्रमोद कुमार, संजय सिंह, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद गुप्ता, संजय कुमार सिंह, ललन कुमार सर्राफ और डॉ. राम वचन राय का मनोनयन राज्यपाल के कोटे से किया गया है। ऐसे में बिहार के 12 एमएलसी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इस मामले पर 13 सितंबर को फैसला लिया जाएगा।