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04-Aug-2025 01:06 PM
By First Bihar
KF-21: भारत अब तक विशेष तौर पर अमेरिकी और रूसी फाइटर जेट्स पर ही निर्भर रहा है पर अब चीजें बदल रहीं हैं। ख़बरों के मुताबिक भारत अब दक्षिण कोरिया के KF-21 बोरमे मल्टीरोल फाइटर जेट में रुचि दिखा रहा है। इस 4.5-जेनरेशन जेट को कोरिया एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज ने विकसित किया है और यह 2026 में दक्षिण कोरियाई वायुसेना में शामिल होगा। भारतीय वायुसेना को अपने पुराने MiG-21 और जगुआर जेट्स को बदलने के लिए 100 से अधिक नए जेट्स की जरूरत है। KF-21 की कीमत 87-110 मिलियन डॉलर प्रति जेट है और यह राफेल और F-35 जैसे महंगे विकल्पों की तुलना में किफायती है। मेक इन इंडिया के तहत भारत इसे देश में बनाना चाहता है, जिसमें स्वदेशी रडार और हथियार भी जोड़े जा सकते हैं।
KF-21 बोरमे की खूबियां इसे आकर्षक बनाती हैं। यह 2200 किमी/घंटा की रफ्तार और 1000 किमी की रेंज के साथ स्टील्थ फीचर्स से लैस है जो दुश्मन के रडार से बच सकता है। इसमें 20 मिमी वल्कन तोप, मेटियोर और साइडविंडर जैसी एयर-टू-एयर मिसाइलें और एयर-टू-ग्राउंड मिसाइलें लगाई जा सकती हैं। इसका डिजाइन एक या दो पायलटों के लिए उपयुक्त है। जिससे युद्ध और प्रशिक्षण दोनों में मदद मिलती है। भारत-चीन सीमा विवाद और पाकिस्तान के खतरे को देखते हुए यह जेट रणनीतिक तौर पर काफी अहम हो सकता है।
हालांकि, इस सौदे में कई चुनौतियां भी हैं। KF-21 अभी टेस्टिंग के ही दौर में है और यह 2026 तक पूरी तरह तैयार नहीं होगा। साथ ही दक्षिण कोरिया को तकनीक हस्तांतरण पर सहमत होना होगा, जिसमें अमेरिकी F414 इंजनों के निर्यात पर US की मंजूरी जरूरी है। हालांकि, इस डील से चीन और उत्तर कोरिया की नाराजगी बढ़ सकती है, वे इसे अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मान सकते हैं। भारत के लिए यह सौदा रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है लेकिन सौदे को अंतिम रूप देने में समय और जटिल बातचीत की जरूरत होगी।
भारत का KF-21 में रुचि लेना सामरिक और आर्थिक दोनों दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। यह जेट IAF की स्क्वाड्रन की संख्या तो बढ़ाएगा ही साथ ही स्वदेशी विनिर्माण को भी प्रोत्साहन देगा। दक्षिण कोरिया पहले ही पोलैंड, UAE और पेरू जैसे देशों को KF-21 ऑफर कर चुका है और भारत के साथ सहयोग दोनों देशों के रक्षा उद्योग को मजबूत कर सकता है। अगर यह डील कामयाब होती है तो यह भारत की रक्षा रणनीति में एक नया अध्याय जोड़ेगा। इससे भारत की अमेरिका और रूस पर निर्भरता भी कम होगी।