BIHAR ELECTION : बिहार में इस साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। सत्ता में काबिज पार्टी हो या विपक्ष—हर कोई अपनी-अपनी रणनीति और शक्ति प्रदर्शन में जुट गया है। दोनों ओर से आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज हो चुका है। लेकिन चुनावी सरगर्मी के बीच एक बार फिर चर्चा 2020 के विधानसभा चुनाव की उठ रही है, जब कई सीटों पर नतीजे बेहद रोमांचक रहे थे और हार-जीत का अंतर हजारों में नहीं बल्कि सैकड़ों और दहाई अंकों तक सिमट गया था। सवाल उठता है कि क्या 2025 में भी वैसा ही नजारा देखने को मिलेगा या समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे।

2020 में कड़े मुकाबले और मामूली फासले

पांच साल पहले हुए चुनाव में करीब तीन दर्जन विधानसभा सीटें ऐसी थीं जहां जीत का अंतर 3000 से भी कम वोटों का रहा। इनमें से 17 सीटें महागठबंधन के खाते में गईं, 19 सीटें एनडीए ने जीतीं और एक निर्दलीय उम्मीदवार ने बाजी मारी।

सबसे बड़ा उदाहरण हिलसा विधानसभा सीट रही, जहां जदयू उम्मीदवार कृष्ण मुरारी शरण ने राजद के शक्ति सिंह यादव को महज 12 वोटों से हराया था। इस नतीजे को लेकर जमकर विवाद और धांधली के आरोप लगे थे।

महागठबंधन की करीबी जीत

इसके अलावा दरभंगा ग्रामीण, राजापाकर, भागलपुर, औरंगाबाद, अलौली और महाराजगंज जैसी कई सीटों पर भी जीत का अंतर 2000 से कम वोट रहा।

एनडीए के खाते की नजदीकी जीत

इसी तरह टिकारी, झाझा, बहादुरपुर और अलीनगर जैसी सीटों पर भी जीत का फासला बेहद कम रहा।

निर्दलीय और लोजपा का प्रदर्शन

2025 में समीकरण नए, लेकिन सवाल वही

2020 का नजारा बताता है कि बिहार चुनाव में कई सीटें बेहद करीबी मुकाबले वाली होती हैं। इस बार गठबंधन बदले हैं, नेता पाला बदल चुके हैं और नए समीकरण तैयार हो रहे हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि क्या 2025 में भी कुछ सीटों पर हार-जीत महज सैकड़ों वोटों में तय होगी या तस्वीर पूरी तरह बदल जाएगी।