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07-Mar-2025 02:46 PM
By First Bihar
Success Story: कहते हैं कि मन में कुछ कर गुजरने की चाहत हो और हौसले बुलंद हो तो इंसान कोई भी मुकाम हासिल कर सकता है। कुछ ऐसी ही कहानी है बिहार के सुपौल के रहने वाले मनोज राय की। अपनी मेहनत और लगन के बल पर मनोज ने आज वह मुकाम हासिल कर लिया जिसको पाने की हर किसी की इच्छा होती है। आईए आज हमको बताते हैं बिहार के मनोज की सफलता की कहानी।
दरअसल, सुपौल के रहने वाले मनोज राय एक ऐसे शख्स हैं, जिन्होंने कभी अंडे बेचे, दफ्तरों में फर्श साफ किए और कभी ठेले पर सब्जियां बेचीं। आज वही मनोज भारतीय आयुध निर्माणी सेवा (IOFS) के अधिकारी के रूप में देश की सेवा कर रहे हैं। UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2010 में 870वीं रैंक हासिल करने वाले मनोज की संघर्ष-गाथा हर उस युवा के लिए प्रेरणा है, जो कठिनाइयों के आगे घुटने टेकने के बजाय अपने सपनों पूरा करने लिए संघर्ष कर रहा है।
सुपौल के एक छोटे से गांव में जन्मे मनोज का बचपन अभावों में बीता। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि दो वक्त की रोटी के लिए भी उन्हें संघर्ष करना पड़ता था। परिस्थितियां इतनी कठिन थीं कि उन्होंने बहुत छोटी उम्र में ही जिम्मेदारियां संभाल ली थीं। साल 1996 में जब हालात और बिगड़े, तो वे दिल्ली चले आए। उम्मीद थी कि वहां कुछ अच्छा काम मिलेगा, लेकिन किस्मत ने उन्हें कठिन रास्ते पर चला दिया। राजधानी दिल्ली में शुरुआत आसान नहीं थी। नौकरी की तलाश में भटकते रहे और जब काम नहीं मिल पाया, तो मनोज ने ठेले पर अंडे और सब्जियां बेचना शुरू किया। इतना ही नहीं, अपने खर्चे निकालने के लिए उन्होंने दफ्तरों में सफाई कर्मचारी के तौर पर भी काम किया।
संघर्ष के दिनों में मनोज दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में डिलीवरी मैन के तौर पर सामान सप्लाई करते थे। यही वह मोड़ था, जिसने उनकी जिंदगी को नया रास्ता दिखाया। JNU के कुछ छात्रों से बातचीत के दौरान उन्होंने UPSC परीक्षा के बारे में जाना। छात्रों ने उन्हें शिक्षा जारी रखने की सलाह दी और बताया कि कैसे यूपीएससी उनकी जिंदगी बदल सकता है। यह वह क्षण था, जब मनोज ने तय किया कि उन्हें सिर्फ रोजी-रोटी कमाने तक सीमित नहीं रहना, बल्कि बड़ा सपना देखना है।
मनोज राय ने श्री अरबिंदो कॉलेज (इवनिंग) में दाखिला लिया और 2000 में BA की डिग्री पूरी की। स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद, मनोज ने UPSC की तैयारी शुरू कर दी। वे पटना गए और वहां प्रसिद्ध शिक्षक रास बिहारी प्रसाद सिंह से मार्गदर्शन लिया। तीन साल की कठिन तैयारी के बाद, 2005 में उन्होंने UPSC का पहला प्रयास किया, लेकिन असफल रहे। दूसरे प्रयास में अंग्रेजी उनके लिए बड़ी चुनौती बन गई।
यूपीएससी में क्वालीफाइंग पेपर के रूप में एक क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी की परीक्षा पास करना अनिवार्य था। अंग्रेजी में कमजोर होने के कारण वे यह परीक्षा पास नहीं कर सके और उनका सपना फिर अधूरा रह गया। तीसरे प्रयास में वे प्रारंभिक परीक्षा तो पास कर गए, लेकिन मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू में सफल नहीं हो सके। यह वह वक्त था, जब कोई भी हताश हो सकता था, लेकिन मनोज ने खुद को टूटने नहीं दिया। मनोज ने अपनी पिछली गलतियों से सीखते हुए अपनी तैयारी का तरीका बदला।
उन्होंने प्रीलिम्स की तैयारी से पहले मेन्स परीक्षा का पूरा सिलेबस कवर करने पर जोर दिया। इससे 80% प्रीलिम्स का पाठ्यक्रम खुद-ब-खुद कवर हो गया। उन्होंने NCERT की किताबों को अच्छी तरह पढ़ा और अपनी लेखन शैली पर खास ध्यान दिया। 2010 में, अपने चौथे प्रयास में उन्होंने सफलता प्राप्त की और 870वीं रैंक के साथ UPSC परीक्षा पास कर ली। मनोज ने अपनी सच्ची मेहनत पर वह मुकाम हासिल कर लिया, जिसका उन्होंने सपना देखा था।