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11-Jan-2026 02:00 PM
By First Bihar
Farmer Registry ID Bihar : बिहार सरकार द्वारा शुरू की गई Farmer Registry ID योजना का उद्देश्य किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ एक ही पहचान के माध्यम से देना है। इसके तहत किसानों का एक डिजिटल डेटाबेस तैयार किया जा रहा है, ताकि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-Kisan), फसल बीमा, बीज अनुदान और अन्य कृषि योजनाओं का लाभ पारदर्शी तरीके से दिया जा सके। लेकिन जमीनी स्तर पर यह योजना बिहार के हजारों किसानों के लिए नई परेशानी बनती नजर आ रही है।
दरअसल, Farmer Registry ID बनाने के लिए सरकार ने यह शर्त रखी है कि किसान के नाम से जमीन की जमाबंदी दर्ज होनी चाहिए। यहीं से समस्या शुरू होती है। बिहार के ग्रामीण इलाकों की हकीकत यह है कि राज्य की बड़ी आबादी पैतृक जमीन पर खेती करती है। ऐसी जमीनें आज भी दादा, परदादा या दिवंगत पिता के नाम पर दर्ज हैं। उत्तराधिकारी वर्षों से उन खेतों में खेती कर रहे हैं, लेकिन दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) नहीं होने के कारण जमीन उनके नाम पर दर्ज नहीं हो पाई है।
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने हाल ही में Farmer Registry ID बनाने की प्रक्रिया शुरू की है। सरकार का दावा है कि इससे फर्जी या अपात्र लाभार्थियों को रोका जा सकेगा और सही किसानों को समय पर योजनाओं का लाभ मिलेगा। इसके लिए आधार कार्ड, बैंक खाता और जमीन से जुड़े रिकॉर्ड अनिवार्य किए गए हैं। लेकिन जिन किसानों के नाम से जमाबंदी नहीं है, वे इन शर्तों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं।
कई जिलों से यह शिकायत सामने आ रही है कि किसान अपने सभी जरूरी कागजात लेकर सरकारी कैंपों में पहुंच रहे हैं। वे आधार कार्ड, बैंक पासबुक और खतियान तक दिखा रहे हैं, लेकिन सिर्फ इसलिए उनकी Farmer Registry ID नहीं बन पा रही है क्योंकि जमीन उनके नाम पर दर्ज नहीं है। ऐसे किसानों को यह कहकर वापस भेज दिया जा रहा है कि पहले म्यूटेशन कराएं, उसके बाद ही आईडी बनेगी।
यह समस्या खासतौर पर गोपालगंज, सीवान, छपरा जैसे जिलों में ज्यादा देखी जा रही है, जहां पैतृक संपत्ति पर खेती का चलन आम है। इन इलाकों में दाखिल-खारिज की प्रक्रिया वर्षों से लंबित रहती है। कई मामलों में जमीन को लेकर पारिवारिक विवाद, दस्तावेजों की कमी या कोर्ट केस की वजह से म्यूटेशन नहीं हो पाया है। नतीजतन, वास्तविक किसान सरकारी रिकॉर्ड में किसान माने ही नहीं जा रहे हैं।
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की गाइडलाइंस के अनुसार, यदि जमीन मालिक की मृत्यु 1 फरवरी 2019 के बाद हुई है, तो उसके उत्तराधिकारी इस योजना का लाभ ले सकते हैं। लेकिन इसके लिए भी जरूरी शर्त यही है कि लैंड रिकॉर्ड में उत्तराधिकारी का नाम दर्ज हो। ऐसे में जिन किसानों का नाम अब तक जमाबंदी में नहीं जुड़ा है, वे पीएम किसान की अगली किस्त से भी वंचित हो सकते हैं।
राजस्व विभाग का कहना है कि प्रक्रिया को सख्त रखना जरूरी है, ताकि फर्जी दावों पर रोक लगाई जा सके। विभागीय अधिकारियों के अनुसार, नामांतरण की प्रक्रिया को तेज करने के निर्देश दिए गए हैं और इसके लिए विशेष अभियान भी चलाए जा रहे हैं। हालांकि, किसान संगठनों का आरोप है कि ऑनलाइन पोर्टल में तकनीकी खामियां हैं और पूरी प्रक्रिया आम किसानों के लिए काफी जटिल है।
किसानों का कहना है कि वे पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। ऐसे में सरकारी योजनाओं से मिलने वाली सहायता उनके लिए बेहद जरूरी है। लेकिन सिर्फ रिकॉर्ड अपडेट न होने के कारण उन्हें योजनाओं से बाहर कर दिया जा रहा है, जो न्यायसंगत नहीं लगता। कई किसान यह सवाल भी उठा रहे हैं कि जब सरकार यह जानती है कि बिहार में अधिकतर जमीनें पैतृक हैं, तो नियम बनाते समय इस सच्चाई को क्यों नजरअंदाज किया गया।
कुल मिलाकर, Farmer Registry ID योजना का उद्देश्य भले ही अच्छा हो, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में यह बिहार के लाखों वास्तविक किसानों को पीएम किसान, बीज अनुदान और अन्य कृषि योजनाओं के लाभ से वंचित कर सकती है। अगर सरकार ने जल्द ही पैतृक जमीन पर खेती करने वाले किसानों के लिए कोई व्यावहारिक समाधान नहीं निकाला, तो यह योजना किसानों के हित में कम और उनकी मुश्किलें बढ़ाने वाली ज्यादा साबित हो सकती है।