1st Bihar Published by: First Bihar Updated Aug 01, 2025, 3:41:14 PM
सावन पुत्रदा एकादशी 2025 - फ़ोटो GOOGLE
Sawan Putrada Ekadashi 2025: सावन मास की अंतिम एकादशी जिसे श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाता है, इस वर्ष 5 अगस्त 2025 (मंगलवार) को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाएगी। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह एकादशी श्रावण शुक्ल पक्ष में आती है और विशेष रूप से संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपत्तियों के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है।
पुत्रदा एकादशी वर्ष में दो बार आती है, पहली पौष मास में और दूसरी सावन मास में। पौष पुत्रदा एकादशी सर्दियों में आती है, जबकि श्रावण पुत्रदा एकादशी वर्षा ऋतु के दौरान मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने, भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करने से न केवल संतान की प्राप्ति होती है, बल्कि मनुष्य के सभी पाप भी नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त होता है।
श्रावण पुत्रदा एकादशी तिथि की शुरुआत 4 अगस्त 2025 को सुबह 11:41 बजे से होगी और इसका समापन 5 अगस्त 2025 को दोपहर 1:12 बजे होगा। चूंकि एकादशी व्रत 'उदयातिथि' के आधार पर रखा जाता है, इसलिए यह व्रत 5 अगस्त को ही मनाया जाएगा।
पूजन विधि
प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
भगवान विष्णु की प्रतिमा को गंगाजल से अभिषेक करें।
पूजा में धूप, दीप, पुष्प, तुलसी दल, नैवेद्य और 16 पूजन सामग्रियों का प्रयोग करें।
भगवान विष्णु को पीले वस्त्र पहनाएं और तुलसी के पत्तों के साथ भोग अर्पित करें।
विष्णु सहस्रनाम या भगवद्गीता का पाठ करें।
संध्या काल में दीपदान करें और रात्रि में व्रत कथा सुनें।
अगले दिन पारण (व्रत खोलना) सूर्य उदय के बाद निर्धारित समय पर करें।
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, यह एकादशी व्रत विशेष रूप से उन दंपत्तियों के लिए अत्यंत शुभ होता है जो संतान सुख की इच्छा रखते हैं। विशेषकर पुत्र की प्राप्ति के लिए यह व्रत अत्यंत प्रभावकारी माना गया है। धार्मिक मान्यता यह भी है कि इस व्रत के पालन से सभी पापों का नाश होता है, ग्रह दोष समाप्त होते हैं और व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पुत्रदा एकादशी का व्रत रक्षाबंधन से ठीक चार दिन पहले आता है और यह भगवान विष्णु को प्रसन्न करने का उत्तम अवसर माना जाता है। विशेष बात यह है कि इस दिन उपवास करने से संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और जीवन में संतुलन प्राप्त होता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय मथुरा के राजा सुखेधन और रानी शैव्या ने संतान की प्राप्ति हेतु पुत्रदा एकादशी का व्रत किया था। उनकी निष्ठा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें एक तेजस्वी पुत्र प्रदान किया। तब से यह व्रत संतान प्राप्ति और परिवारिक सुख के लिए किया जाने लगा।