Bihar News : बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर बहाली के नियम बदलेंगे, जान लीजिए क्या होगा एग्जाम पैटर्न और पात्रता से जुड़ी शर्तें

बिहार के विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति अब लिखित परीक्षा से होगी। नई नियमावली के तहत 160 अंक की परीक्षा और 40 अंक का इंटरव्यू होगा।

1st Bihar Published by: First Bihar Updated Mar 09, 2026, 7:22:05 AM

Bihar News : बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर बहाली के नियम बदलेंगे, जान लीजिए क्या होगा एग्जाम पैटर्न और पात्रता से जुड़ी शर्तें

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Bihar News : बिहार के विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। अब असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली लिखित परीक्षा के माध्यम से की जाएगी। इसके लिए नई नियमावली तैयार की जा रही है, जिसमें 160 अंकों की लिखित परीक्षा और 40 अंकों के साक्षात्कार का प्रावधान रखा गया है। इस तरह पूरी चयन प्रक्रिया 200 अंकों की होगी।


राजभवन ने इस नई नियमावली का मसौदा राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को भेज दिया है। उनसे इस पर हस्ताक्षर और सुझाव मांगे गए हैं। कुलपतियों को अपने मंतव्य देने के लिए 10 दिनों का समय दिया गया है। माना जा रहा है कि यदि सभी कुलपतियों की सहमति मिल जाती है, तो यह नियमावली जल्द ही लागू कर दी जाएगी।


प्रस्तावित नियमावली के अनुसार सहायक प्राध्यापक पद के लिए लिखित परीक्षा वर्णनात्मक (डिस्क्रिप्टिव) होगी। इसका उद्देश्य अभ्यर्थियों के विषय ज्ञान, विश्लेषणात्मक क्षमता और अकादमिक समझ का आकलन करना है। नई व्यवस्था के तहत चयन प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और प्रतिस्पर्धात्मक बनाने की कोशिश की जा रही है।


मसौदे में अभ्यर्थियों के लिए न्यूनतम आयु सीमा 23 वर्ष और अधिकतम आयु सीमा 45 वर्ष निर्धारित की गई है। इसके साथ ही चयन प्रक्रिया में अनुभव को अलग से अंक देने का प्रावधान नहीं रखा गया है। इसी प्रकार नेट, जेआरएफ और पीएचडी जैसी योग्यताओं को केवल पात्रता के रूप में माना जाएगा, लेकिन इनके लिए अतिरिक्त अंक नहीं दिए जाएंगे।


इस नियमावली के अनुसार बहाली की पूरी प्रक्रिया बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग के माध्यम से कराई जाएगी। साक्षात्कार बोर्ड में शामिल सभी सदस्य प्रोफेसर रैंक के होंगे, ताकि चयन प्रक्रिया की गुणवत्ता और निष्पक्षता बनी रहे।


सूत्रों के अनुसार यदि सभी विश्वविद्यालयों के कुलपति इस नियमावली पर अपनी सहमति दे देते हैं, तो इसे 12 मार्च से पहले ही लागू किया जा सकता है। हालांकि यदि किसी विश्वविद्यालय की ओर से आपत्ति या संशोधन का सुझाव आता है, तो इसे लागू होने में थोड़ा समय लग सकता है।


नई नियमावली लागू होने के बाद राज्य के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में लंबे समय से खाली पड़े सहायक प्राध्यापक के पदों पर नियुक्ति का रास्ता साफ होने की उम्मीद है। इससे न केवल शिक्षकों की कमी दूर होगी, बल्कि उच्च शिक्षा व्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।


योग्यता के मामले में अभ्यर्थियों के लिए राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा, जो यूजीसी या सीएसआईआर द्वारा आयोजित की जाती है। इसके अलावा यूजीसी द्वारा मान्यता प्राप्त समान स्तर की राष्ट्रीय परीक्षा या बिहार सरकार द्वारा आयोजित राज्य स्तरीय पात्रता परीक्षा (स्लेट/सेट) भी मान्य होगी।


हालांकि जिन अभ्यर्थियों के पास संबंधित विषय में पीएचडी डिग्री है और वह यूजीसी के एमफिल/पीएचडी डिग्री प्रदान करने के न्यूनतम मानक एवं प्रक्रिया विनियम 2009 या 2016 के अनुसार प्राप्त की गई है, उन्हें नेट या स्लेट/सेट से छूट दी जा सकती है।


इसके अलावा जिन अभ्यर्थियों ने 11 जुलाई 2009 से पहले पीएचडी कार्यक्रम में पंजीकरण कराया था, वे उस समय लागू विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार पात्र माने जाएंगे। ऐसे अभ्यर्थियों को भी नेट या राज्य स्तरीय पात्रता परीक्षा से छूट मिल सकती है, लेकिन इसके लिए कुछ शर्तों को पूरा करना आवश्यक होगा।


इन शर्तों में पीएचडी डिग्री का नियमित मोड में होना, शोधप्रबंध का मूल्यांकन कम से कम दो बाहरी परीक्षकों द्वारा किया जाना और ओपन पीएचडी वाइवा-वोसे का आयोजन शामिल है। इसके साथ ही अभ्यर्थी को अपने शोध कार्य से जुड़े कम से कम दो शोध पत्र प्रकाशित करने होंगे, जिनमें से एक रेफरीड जर्नल में प्रकाशित होना अनिवार्य होगा।


साथ ही अभ्यर्थी को अपने पीएचडी शोधकार्य पर आधारित कम से कम दो शोध पत्र ऐसे सेमिनार या सम्मेलन में प्रस्तुत करने होंगे, जो यूजीसी, आईसीएसएसआर, सीएसआईआर या किसी समान एजेंसी द्वारा प्रायोजित या समर्थित हों। इन सभी शर्तों की पूर्ति का प्रमाण संबंधित विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार या डीन (एकेडमिक अफेयर्स) द्वारा प्रमाणित किया जाएगा।


राजभवन ने राज्य उच्चतर शिक्षा परिषद से भी 15 दिनों के भीतर इस नए परिनियम पर अपनी राय देने को कहा है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि नई और स्पष्ट चयन प्रक्रिया से योग्य अभ्यर्थियों को अवसर मिलेगा और विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक गुणवत्ता को भी बढ़ावा मिलेगा।