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Pitru Paksha 2025: पितरों की शांति के लिए कैसे करें सही पिंडदान? जानिए... पितृ पक्ष के नियम

Pitru Paksha 2025: पितृ पक्ष के 15 दिनों को "श्राद्ध पक्ष" भी कहा जाता है। इन दिनों में पितरों की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए विधिपूर्वक श्राद्ध, तर्पण, और पिंडदान जैसे कर्म किए जाते हैं। जानिए... सही नियम।

1st Bihar Published by: First Bihar Updated Sep 09, 2025, 11:50:27 AM

Pitru Paksha 2025

पितृ पक्ष 2025 - फ़ोटो GOOGLE

Pitru Paksha 2025: हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का समय अत्यंत पावन और महत्व का माना गया है। यह पूरा कालखंड दिवंगत पूर्वजों को समर्पित होता है। मान्यता है कि इस दौरान हमारे पूर्वज पृथ्वी पर आते हैं और अपने वंशजों से तर्पण, पिंडदान व श्राद्ध के माध्यम से तृप्ति की अपेक्षा करते हैं। इस वर्ष पितृ पक्ष की शुरुआत आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि यानी 7 सितंबर 2025 से हो चुकी है और इसका समापन सर्व पितृ अमावस्या, 21 सितंबर 2025 को होगा।


पितृ पक्ष के 15 दिनों को "श्राद्ध पक्ष" भी कहा जाता है। इन दिनों में पितरों की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए विधिपूर्वक श्राद्ध, तर्पण, और पिंडदान जैसे कर्म किए जाते हैं। मान्यता है कि इस दौरान श्रद्धा और नियमपूर्वक किए गए श्राद्ध से पितर संतुष्ट होकर वंशजों को सुख-समृद्धि और आरोग्यता का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। वहीं, यदि इन कर्मों को सही विधि और नियमों के अनुसार न किया जाए, तो पितर अप्रसन्न होकर "पितृ दोष" उत्पन्न कर सकते हैं, जिससे जीवन में आर्थिक, मानसिक और पारिवारिक बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं।


ऐसे में पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध करते समय कुछ आवश्यक नियमों का पालन करना बेहद जरूरी होता है। आइए जानते हैं ऐसे ही 10 महत्वपूर्ण नियम, जो हर व्यक्ति को पितृ पक्ष में अवश्य अपनाने चाहिए


श्राद्ध के 10 जरूरी नियम 

अपराह्न (दोपहर) का समय सबसे श्रेष्ठ- श्राद्ध हमेशा दोपहर के समय, यानी सूर्य के मध्य आकाश में रहने के दौरान किया जाना चाहिए। यह समय पितरों के लिए सबसे उपयुक्त और फलदायक माना गया है।


दक्षिण दिशा की ओर मुख रखें- श्राद्ध करते समय व्यक्ति को दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि दक्षिण दिशा को "पितृलोक" की दिशा माना गया है।


सूर्यास्त के बाद श्राद्ध वर्जित- पितृ पक्ष में कोई भी श्राद्ध कर्म सूर्यास्त के बाद नहीं किया जाना चाहिए। ऐसा करने से कर्म निष्फल हो जाता है।


श्राद्ध अपनी भूमि या तीर्थ पर करें- श्राद्ध कर्म यदि संभव हो तो अपने घर या अपनी भूमि पर करें। यदि यह संभव न हो तो तीर्थस्थलों, पवित्र नदियों या मंदिर के निकट श्राद्ध करना श्रेष्ठ होता है।


ब्राह्मणों को आमंत्रण देकर भोजन कराएं- श्राद्ध के लिए कम से कम तीन ब्राह्मणों को श्रद्धा से आमंत्रित कर उन्हें सात्विक भोजन कराना चाहिए।


दान और दक्षिणा अनिवार्य है- श्राद्ध के बाद ब्राह्मणों, ज़रूरतमंदों और गरीबों को वस्त्र, अन्न और दक्षिणा देकर विदा करें। बिना दान-दक्षिणा श्राद्ध अधूरा माना जाता है।


घर में पवित्रता और शांति बनाए रखें- श्राद्ध वाले दिन घर में कलह, झगड़े, अपवित्रता या अशांति नहीं होनी चाहिए। यह पितरों की तृप्ति में बाधक होता है।


जीव-जंतुओं को भी दें अंश- श्राद्ध के भोजन का एक भाग गाय, कुत्ते, चींटी और कौवे को अवश्य दें। ये जीव पितरों तक अन्न पहुंचाने के माध्यम माने जाते हैं।


कुशा और तिल का प्रयोग करें- श्राद्ध में कुशा (दर्भा घास) और काले तिल का प्रयोग अनिवार्य होता है। यह सामग्री पवित्रता और कर्म की पूर्णता का प्रतीक मानी जाती है।


संयमित रहेंकटिंग-शेविंग से बचें- श्राद्ध वाले दिन बाल, नाखून, दाढ़ी आदि कटवाने से बचना चाहिए। साथ ही साधक को संयमित और श्रद्धावान रहकर कर्म करना चाहिए। 


अगर व्यक्ति की कुंडली में पितृ दोष हो या अक्सर घर में नकारात्मकता, बीमारियां, या पारिवारिक कलह होती हो, तो पितृ पक्ष में ये उपाय करने चाहिए, जिसमें गया, प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक या उज्जैन जैसे तीर्थों पर जाकर पिंडदान करें। घर में श्रीमद्भागवत कथा, विष्णु सहस्रनाम, या गरुड़ पुराण का पाठ करवाएं। शनिवार को पीपल वृक्ष के नीचे दीपक जलाएं और जल अर्पित करें। कन्याओं, वृद्धों और गरीबों को वस्त्र, भोजन और दक्षिणा दें।


पितृ पक्ष न केवल हमारे पूर्वजों की स्मृति को सम्मान देने का अवसर है, बल्कि यह आत्मिक और पारिवारिक कल्याण का द्वार भी है। यदि इस अवधि में विधिपूर्वक श्राद्ध कर्म किया जाए, तो न केवल पितर प्रसन्न होते हैं, बल्कि जीवन की कई बाधाएं भी दूर हो जाती हैं। इसलिए श्राद्ध के इन नियमों को जानना और उनका पालन करना हर व्यक्ति का कर्तव्य है।