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ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए मराठी बोलना अनिवार्य, महाराष्ट्र सरकार के फैसले से यूपी-बिहार में गरमाई सियासत; RJD ने बताया तानाशाही आदेश

Marathi language rule: महाराष्ट्र में ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा अनिवार्य करने के फैसले पर यूपी-बिहार में राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। सरकार ने फिलहाल नियम टालकर 100 दिन का अभियान शुरू किया है।

Marathi language rule
भाषा पर गरमाई सियासत
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Mukesh Srivastava
3 मिनट

Marathi language rule: महाराष्ट्र में ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा को अनिवार्य करने के राज्य सरकार के फैसले ने उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में तीखी बहस छेड़ दी है। हालांकि महाराष्ट्र सरकार ने इस नियम को फिलहाल टालते हुए 100 दिनों का अभियान चलाने का निर्णय लिया है, लेकिन इस मुद्दे ने एक बार फिर भाषाई और क्षेत्रीय राजनीति को गरमा दिया है।


परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने पहले घोषणा की थी कि 1 मई से लाइसेंसधारी ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी बोलना, पढ़ना और लिखना अनिवार्य होगा, और ऐसा न करने पर लाइसेंस रद्द करने तक की बात कही गई थी। इस फैसले के बाद यूनियनों के विरोध को देखते हुए सरकार ने इसे फिलहाल स्थगित कर दिया और केवल “कार्य के लिए आवश्यक मराठी” तक सीमित करते हुए 100 दिनों की मोहलत देने का निर्णय लिया है।


इस मुद्दे पर यूपी और बिहार के नेताओं ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दी हैं। भाजपा नेता गुरु प्रकाश पासवान ने कहा कि क्षेत्रीय पहचान का सम्मान जरूरी है, लेकिन देश में हर नागरिक को समान अवसर मिलना चाहिए। जेडीयू प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने सुझाव दिया कि वर्षों से रहने वाले गैर-मराठी लोगों को भाषा सीखने के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए। वहीं, निषाद पार्टी के संजय निषाद ने इसे सद्भाव बिगाड़ने वाला कदम बताया और कहा कि सरकार को प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए।


आरजेडी नेता और राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा ने इस फैसले को “अजीबोगरीब तानाशाही आदेश” बताते हुए कहा कि भाषाएं नहीं लड़तीं, बल्कि उन्हें राजनीति का हथियार बनाया जाता है। समाजवादी पार्टी के नेता माता प्रसाद पांडेय ने चेतावनी दी कि यूपी के हजारों लोग महाराष्ट्र में काम करते हैं और ऐसे फैसले उनकी आजीविका को प्रभावित कर सकते हैं। कांग्रेस ने भी इसे संघीय ढांचे और मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताया है।


आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 के अनुसार, देश के कुल कार्यबल का लगभग 37 प्रतिशत हिस्सा यूपी और बिहार से आता है। इनमें से बड़ी संख्या मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य शहरों में ऑटो-टैक्सी जैसे कामों में लगी हुई है। ऐसे में भाषा की अनिवार्यता का सीधा असर प्रवासी श्रमिकों की रोज़ी-रोटी पर पड़ सकता है।


महाराष्ट्र में मराठी और “भूमिपुत्र” का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है। शिवसेना और मनसे जैसी पार्टियां अक्सर इसे अपनी राजनीति में प्रमुख मुद्दा बनाती रही हैं। अब परिवहन मंत्री का यह फैसला भी उसी विचारधारा की निरंतरता माना जा रहा है।


कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि संविधान का अनुच्छेद 19(1)(g) हर नागरिक को देश में कहीं भी व्यापार और रोजगार करने का अधिकार देता है। ऐसे में भाषा के आधार पर रोजगार पर प्रतिबंध लगाना मौलिक अधिकारों के खिलाफ माना जा सकता है।

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रिपोर्टर

FIRST BIHAR

FirstBihar संवाददाता