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झारखंड में नक्सली लेते थे हथियार चलाने की ट्रेनिंग, माओवाद के अड्डे से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता कदम

झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमा पर स्थित बूढ़ापहाड़, जो कभी माओवादियों का गढ़ और ट्रेनिंग सेंटर था, अब बदलाव की राह पर है।

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Jharkhand News: झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमा पर स्थित बूढ़ापहाड़, जो कभी माओवादियों का गढ़ और ट्रेनिंग सेंटर था, अब बदलाव की राह पर है। सुरक्षाबलों द्वारा नक्सल मुक्त घोषित किए जाने के बाद सरकार और प्रशासन ने युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए रोजगार और स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रम शुरू किए हैं।


युवाओं को मिल रही मैकेनिक की ट्रेनिंग

पहले चरण में 30 युवाओं को मोटरसाइकिल और मोटर मैकेनिक की ट्रेनिंग दी जा रही है। इसके लिए लातेहार के बरवाडीह के मंडल में विशेष कैंप लगाया गया है। इस पहल को पलामू टाइगर रिजर्व प्रशासन द्वारा शुरू किया गया है, जिससे आधा दर्जन गांवों के युवाओं को स्थायी रोजगार के अवसर मिल सकें। पलामू टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक प्रजेश कांत जेना ने बताया कि बूढ़ापहाड़ क्षेत्र में सर्वे के बाद यह पाया गया कि 12वीं पास करने के बाद कई युवा मजदूरी करने को मजबूर थे। कुछ रोजगार की तलाश में पलायन कर जाते थे। इसलिए, स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराने के लिए यह पहल की गई है।


"अब बाहर नहीं जाना पड़ेगा"

चरर गांव के रहने वाले गौतम कुमार ने बताया कि ट्रेनिंग पूरी होने के बाद वह आसपास के इलाके में अपनी दुकान खोलने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने कहा,

"नक्सलियों के डर से लोग बाहर चले गए थे, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। रोजगार के अवसर मिलने पर हमें बाहर नहीं जाना पड़ेगा।"


बूढ़ापहाड़: कभी था माओवादियों का गढ़

तीन दशक तक माओवादियों का कब्जा

2012-13 में बना यूनिफाइड कमांड और ट्रेनिंग सेंटर

2023 में सुरक्षाबलों ने किया नक्सल मुक्त घोषित

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बूढ़ापहाड़ इलाका गढ़वा, लातेहार और छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में फैला हुआ है। इस क्षेत्र में 27 गांव हैं, जहां करीब 4000 परिवार रहते हैं। यहां 76% अनुसूचित जाति और 8% अनुसूचित जनजाति के लोग निवास करते हैं।


सरकार की खास नजर, पलायन रोकने की कोशिश

सरकार इस इलाके के युवाओं को रोजगार से जोड़कर पलायन रोकने की दिशा में काम कर रही है। स्थानीय स्तर पर ट्रेनिंग प्रोग्राम्स, स्वरोजगार योजनाएं और बुनियादी ढांचे का विकास किया जा रहा है।