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जस्टिस यशवंत वर्मा ने दिया इस्तीफा, घर से मिले थे 'जले हुए नोट', महाभियोग से पहले बड़ा कदम

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने जले नोट विवाद और महाभियोग प्रक्रिया के बीच राष्ट्रपति को इस्तीफा दे दिया। इस फैसले ने न्यायपालिका में हलचल तेज कर दी है।

जस्टिस यशवंत वर्मा ने दिया इस्तीफा, घर से मिले थे 'जले हुए नोट', महाभियोग से पहले बड़ा कदम
Tejpratap
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4 मिनट

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने आखिरकार अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने यह इस्तीफा सीधे द्रौपदी मुर्मू को सौंपा है। उनके इस्तीफे के साथ ही पिछले कई हफ्तों से चल रहा विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है।


गौरतलब है कि जस्टिस वर्मा का हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट में तबादला किया गया था। यह ट्रांसफर उस समय हुआ जब उनके सरकारी आवास से कथित तौर पर बड़ी मात्रा में जले हुए नोट मिलने का मामला सामने आया था। इस घटना ने न्यायपालिका के भीतर और बाहर दोनों जगह हलचल मचा दी थी।


जानकारी के मुताबिक, जस्टिस वर्मा ने 5 अप्रैल 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी। हालांकि उनका कार्यकाल काफी छोटा रहा और कुछ ही समय बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। अपने त्यागपत्र में उन्होंने इस्तीफे की वजह स्पष्ट नहीं की, लेकिन इस पद पर सेवा करने को अपने जीवन का सम्मानजनक अवसर बताया।


अपने इस्तीफे में जस्टिस वर्मा ने लिखा कि वे उन कारणों का खुलासा नहीं करना चाहते जिनकी वजह से उन्हें यह कदम उठाना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि भारी मन से वे तत्काल प्रभाव से न्यायाधीश पद छोड़ रहे हैं। उनके इस बयान से यह साफ है कि वे विवाद पर सार्वजनिक रूप से कुछ भी कहने से बचना चाहते हैं।


पूरा मामला 14 मार्च 2025 का है, जब दिल्ली स्थित उनके आधिकारिक आवास के एक स्टोररूम में अचानक आग लग गई थी। आग बुझाने के दौरान मौके पर मौजूद टीम को बड़ी मात्रा में नकदी मिली, जिसमें कई नोट जल चुके थे। इस घटना के सामने आते ही मामला बेहद गंभीर हो गया और न्यायपालिका की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे।


इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने इस पूरे मामले की जांच के लिए एक इन-हाउस कमेटी का गठन किया। इस समिति ने अपनी जांच में जस्टिस वर्मा के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की सिफारिश की थी, जिसमें उन्हें पद से हटाने की बात भी शामिल थी।


विवाद बढ़ने के बाद मार्च 2025 के अंत में जस्टिस वर्मा का तबादला दिल्ली हाईकोर्ट से उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया। हालांकि उस समय उन्होंने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था और पद पर बने रहने का फैसला किया था।


इसी बीच संसद में उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया भी शुरू हो गई। लोकसभा के 146 सांसदों ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ने जजों की जांच से जुड़े अधिनियम के तहत तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया, जो अभी अपनी प्रक्रिया में लगी हुई थी।


राजनीतिक और न्यायिक दबाव के बीच जस्टिस वर्मा के पास विकल्प सीमित होते जा रहे थे। माना जा रहा है कि महाभियोग की प्रक्रिया और जांच के चलते उनकी स्थिति और कमजोर हो गई थी। ऐसे में उन्होंने अंततः इस्तीफा देना ही उचित समझा।


जस्टिस यशवंत वर्मा का यह इस्तीफा न केवल उनके व्यक्तिगत करियर के लिए बड़ा झटका है, बल्कि यह मामला न्यायपालिका की साख और पारदर्शिता पर भी कई सवाल खड़े करता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच समिति की रिपोर्ट क्या निष्कर्ष निकालती है और इस पूरे प्रकरण का न्यायिक व्यवस्था पर क्या असर पड़ता है।