घरेलू जिम्मेदारियों और वैवाहिक रिश्तों को लेकर एक अहम फैसले में Bombay High Court ने साफ कहा है कि पत्नी को सिर्फ खाना बनाने और घर की साफ-सफाई करने वाली “नौकरानी” नहीं समझा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि शादी बराबरी का रिश्ता है, कोई सर्विस कॉन्ट्रैक्ट नहीं, जहां पत्नी से हर समय घरेलू काम करवाने की उम्मीद की जाए।
हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी एक पति-पत्नी के लंबे समय से चल रहे पारिवारिक विवाद की सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के पुराने फैसले को रद्द करते हुए पति को अपनी अलग रह रही पत्नी को हर महीने 20 हजार रुपये गुज़ारा भत्ता देने का आदेश दिया है। साथ ही पति को तलाक देने वाला आदेश भी खारिज कर दिया गया।
क्या था पूरा मामला?
मामला एक चार्टर्ड अकाउंटेंट पति और उसकी पत्नी से जुड़ा है, जिनकी शादी साल 2002 में हुई थी। शादी के कुछ समय बाद ही दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया। पति ने कोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि उसकी पत्नी खाना नहीं बनाती, घर की साफ-सफाई ठीक से नहीं करती और उसके माता-पिता की बात नहीं मानती। पति का दावा था कि पत्नी के इस व्यवहार से उसे मानसिक तनाव हुआ और यह “मानसिक क्रूरता” की श्रेणी में आता है।
इसी आधार पर उसने तलाक की मांग की थी। फैमिली कोर्ट ने वर्ष 2010 में पति के पक्ष में फैसला देते हुए उसे तलाक की अनुमति दे दी थी। साथ ही पत्नी को गुज़ारा भत्ता देने से भी इनकार कर दिया गया था।
हालांकि पत्नी ने इन आरोपों को गलत बताया। उसका कहना था कि उससे घर के लगभग सारे काम करवाए जाते थे। उसे बर्तन धोने, साफ-सफाई और खाना बनाने के लिए मजबूर किया जाता था। इतना ही नहीं, उसने यह भी आरोप लगाया कि कई बार उसे बचा हुआ खाना खाने तक के लिए कहा जाता था।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने पति के तर्कों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि केवल खाना न बनाना या सफाई न करना “क्रूरता” नहीं माना जा सकता। शादी में दोनों पक्षों की बराबर भागीदारी होती है और पत्नी को घरेलू नौकरानी की तरह नहीं देखा जा सकता।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि शादीशुदा जीवन में शुरुआती दिनों में छोटे-मोटे विवाद और तालमेल बैठाने में दिक्कतें होना सामान्य बात है। इन्हें मानसिक क्रूरता का आधार नहीं बनाया जा सकता।
जजों ने साफ शब्दों में कहा कि पति-पत्नी का रिश्ता सम्मान, समझदारी और समान अधिकारों पर आधारित होना चाहिए। पत्नी से यह उम्मीद करना कि वह हर समय केवल घर के काम करे, गलत सोच को दर्शाता है।
गुज़ारा भत्ता देने का आदेश
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को भी गलत माना, जिसमें कहा गया था कि पत्नी “आर्ट और क्राफ्ट” की क्लास लेकर कमाई कर सकती है, इसलिए उसे भरण-पोषण की जरूरत नहीं है।
हाई कोर्ट ने कहा कि कभी-कभार छोटे स्तर पर कोई काम करना स्थायी आय का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने पति को हर महीने 20 हजार रुपये गुज़ारा भत्ता देने का आदेश दिया।
फैसले की हो रही चर्चा
हाई कोर्ट का यह फैसला अब काफी चर्चा में है। सोशल मीडिया पर भी लोग इस फैसले को महिलाओं के सम्मान और वैवाहिक रिश्तों में बराबरी की सोच से जोड़कर देख रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि यह फैसला समाज में उन पुरानी सोच को चुनौती देता है, जहां शादी के बाद महिलाओं से सिर्फ घरेलू काम की उम्मीद की जाती है।




