सोशल मीडिया ने आज की युवा पीढ़ी को रातों-रात स्टार बनने का सपना दिखाया है। रील, शॉर्ट वीडियो और यूट्यूब कंटेंट बनाने की होड़ में हजारों युवा हर दिन नए-नए प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या लाइक और व्यूज की इस दौड़ में कानून और समाज की मर्यादाएं भी पीछे छूटती जा रही हैं? और उससे भी बड़ा सवाल यह कि अगर किसी की हरकत किसी को पसंद नहीं आती, तो क्या भीड़ को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार मिल जाता है?
पूर्वी चंपारण से सामने आया एक वायरल वीडियो इन्हीं सवालों को जन्म देता है। सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे इस वीडियो में कुछ युवक और एक युवती ग्रामीण इलाके के एक आम के बगीचे में मौजूद दिखाई दे रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि वे रील और यूट्यूब वीडियो की शूटिंग कर रहे थे। इसी दौरान गांव के कुछ युवकों ने उन्हें घेर लिया और कथित तौर पर बांस के डंडों से उनकी बेरहमी से पिटाई कर दी।हालांकि, इस वायरल वीडियो की पुष्टि फर्स्ट बिहार झारखंड नहीं करता है ।
वायरल वीडियो में जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं। कई ग्रामीण युवक तीन-चार लड़कों को घेरकर बांस के डंडों से पीटते हुए नजर आ रहे हैं। वहीं उनके साथ मौजूद एक युवती का हाथ पकड़कर उसे रोके रखने और उसके परिजनों को बुलाने की बात भी वीडियो में सुनाई देती है।
रील का जुनून या भीड़ का कानून?
यह घटना केवल सोशल मीडिया की अंधी दौड़ पर ही सवाल नहीं उठाती, बल्कि भीड़ के बढ़ते दुस्साहस पर भी गंभीर चिंता पैदा करती है। यदि किसी युवक या युवती की गतिविधि संदिग्ध या आपत्तिजनक लगती है, तो कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी पुलिस और प्रशासन की होती है, न कि गांव के लोगों की। किसी भी परिस्थिति में किसी व्यक्ति को पकड़कर सार्वजनिक रूप से बांस के डंडों से पीटना कानूनन अपराध है। भीड़ द्वारा दी गई सजा न केवल संविधान की भावना के खिलाफ है, बल्कि यह कानून के शासन को भी चुनौती देती है।
सोशल मीडिया का दूसरा चेहरा
यह भी सच है कि आज कई कंटेंट क्रिएटर व्यूज और फॉलोअर्स के लिए सार्वजनिक स्थानों, धार्मिक स्थलों, खेतों, बगीचों और निजी संपत्तियों तक में बिना अनुमति वीडियो शूट करते हैं। कई बार ऐसे वीडियो स्थानीय लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाते हैं या विवाद का कारण बनते हैं। लेकिन सवाल फिर वही है—क्या इसका फैसला भीड़ करेगी या कानून?
सिस्टम से बड़ा सवाल
अगर युवाओं की हरकत गलत थी, तो पुलिस को सूचना क्यों नहीं दी गई? अगर गांव वालों को आपत्ति थी, तो प्रशासन को बुलाकर कार्रवाई क्यों नहीं कराई गई? क्या अब गांव-गांव में भीड़ ही अदालत और भीड़ ही सजा सुनाने लगी है?ऐसी घटनाएं यह भी बताती हैं कि कानून के प्रति लोगों का भरोसा कमजोर पड़ रहा है। यदि हर विवाद का फैसला भीड़ करने लगेगी, तो फिर न्याय व्यवस्था की जरूरत क्या रह जाएगी?
प्रशासन से कार्रवाई की मांग
वायरल वीडियो सामने आने के बाद पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी हो गई है। पुलिस को यह पता लगाना चाहिए कि वीडियो कब और कहां का है, किन लोगों ने मारपीट की, क्या पीड़ितों ने शिकायत दर्ज कराई है और घटना के पीछे वास्तविक वजह क्या थी। यदि वीडियो में दिखाई दे रहे युवक-युवती नाबालिग हैं, तो उनके अधिकारों की रक्षा करना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है। साथ ही, मारपीट करने वालों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी भीड़ खुद को कानून से ऊपर न समझे।





