BIHAR ELECTION : बिहार में यह चुनावी साल है। ऐसे में नेताओं का हरेक कदम काफी फूंक-फूंक कर उठाया जा रहा है। इस चुनावी मौसम में नेताओं का दौरा भी काफी सोच-विचार कर तैयार किया जा रहा है। भले ही यह दौरा उनके खुद के संसदीय इलाके का हो या फिर विधानसभा का हो। लेकिन इस दौरान नेताओं का इलाके में कार्यक्रम की रूपरेखा भी इस तरह से तैयार किया जाता है कि वह अपनी पार्टी को काफी हद तक लाभ पहुंचा सके और विरोधियों की मुसीबत और बढ़ा सके। ऐसे में आज जदयू के एक कद्दावर नेता का दौरा उनके संसदीय इलाके में, खासकर उस जगह पर होने वाला है जहां पिछले दिनों एक नेता ने यह कहा था कि उन्हें टिकट मिले या न मिले, वह चुनाव तो लड़ेंगे ही लड़ेंगे।
दरअसल, पिछले साल बिहार की राजनीति में पाला बदल का खेल हुआ और उस दौरान सरकार में सहयोगी पार्टी के कुछ विधायक गठबंधन बदलने की वजह से विपक्ष में हो गए थे। लेकिन उन्होंने थोड़ी चालाकी दिखाई और जब ऑफर मिला तो सत्ता पक्ष में शामिल हो गए। जिसको लेकर सदन के अंदर खूब शोर-गुल भी हुआ। लेकिन उस दौरान चुनाव को लेकर कोई खास चर्चा थी नहीं, तो जिस पार्टी के साथ जुड़े, उन्हें भी यह सोचना नहीं था कि उन्हें विधानसभा में सिंबल देना होगा या नहीं।
वहीं, अब जब चुनाव का समय नजदीक आया है तो सत्तारूढ़ दल के एक कद्दावर नेता अपने संसदीय इलाके में जाते हैं और इशारों-इशारों में पाला बदलकर उनके साथ आने वाले नेता को यह संदेश देते हैं कि उनकी पार्टी पाला बदलकर आए नेता जी को सिंबल देने के बारे में विचार भी नहीं कर रही है। इसके बाद पाला बदलने वाले नेता जी यह कहते हैं कि सिंबल मिले या न मिले, हम तो चुनाव लड़ेंगे ही लड़ेंगे। उसके बाद कुछ दिन तक मामला शांत रहता है, लेकिन अब आज यह मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है।
जानकारी के मुताबिक, सत्तारूढ़ दल के यह कद्दावर नेता आज के दिन खासकर उस इलाके में सभा करने वाले हैं, जहां से यह नेता, जो पाला बदलकर इनके साथ आए हैं, विधायक हैं और इस इलाके में वह खुद को बेहद ताकतवर मानकर चलते हैं। लेकिन अब इस इलाके में वह नेता दौरा कर रहे हैं जिनके जाने से ही उस इलाके का पूरा समीकरण अलग तरह से तैयार होने लगता है। यह शाम-दाम-दंड-भेद इस तरह से लगाते हैं कि बड़े-बड़े अनुभवी भी चारों खाने चित्त हो जाते हैं। ऐसे में अब यह नेता जी, जो पाला बदलकर आए हैं, उनके माथे पर काफी पसीना देखा जा रहा है। उनके समझ में नहीं आ रहा है कि वह करें तो क्या करें? अब उनके पास विकल्प मात्र यह है कि या तो बिना किसी सिंबल के मैदान में आएं और अपना किला बचा लें, या फिर अपनी आंखों के सामने अपना किला दूसरे के हाथों में देखें।
आपको बताते चलें कि हम जिस विधानसभा सीट की बात कर रहे हैं, वहां 2020 में राष्ट्रीय जनता दल ने जीत दर्ज की थी। इस बार परिणाम किस पार्टी के पक्ष में होंगे, यह जनता को तय करना है। लेकिन यह सीट उस जिले में आती है जहां सत्तारूढ़ दल के कद्दावर नेता का तूती बोलता है। इस विधानसभा सीट पर 2020 में कुल 32.82 प्रतिशत वोट पड़े थे। 2020 में वर्तमान सत्तारूढ़ दल के नेता को 9,589 वोटों के मार्जिन से हराया गया था।





