1st Bihar Published by: First Bihar Updated Sat, 06 Sep 2025 01:19:09 PM IST
प्रतीकात्मक - फ़ोटो Google
Bihar News: राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की ताज़ा रिपोर्ट ने बिहार में ऑनलाइन गेमिंग की लत के खतरनाक प्रभावों को उजागर किया है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के लगभग 35 लाख किशोर ऑनलाइन गेम्स में पैसे दांव पर लगाते थे, जिनमें से 25 लाख (लगभग 70%) अब मानसिक तनाव और बीमारियों से जूझ रहे हैं। यह लत बच्चों की पढ़ाई, करियर और पारिवारिक माहौल को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। बच्चे अपनी पॉकेट मनी खर्च करने के बाद घर से पैसे चुराने और कर्ज लेने तक की हद तक पहुंच गए हैं। एक साल में इन बच्चों ने ऑनलाइन गेम्स पर करीब 5 करोड़ रुपये गंवा दिए हैं, जिससे कई परिवारों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है।
इस रिपोर्ट में बताया गया कि बच्चे शुरुआत में अपनी जेब खर्च से गेम्स खेलते हैं, लेकिन हारने पर वे घर से पैसे चुराने या दोस्तों और साहूकारों से कर्ज लेने लगते हैं। कई मामलों में छोटी रकम से शुरूआत लाखों के नुकसान में बदल गई। वैशाली के 15 वर्षीय वरुण सिंह ने ऑनलाइन कैसिनो गेम्स, रम्मी, माई टीम 11 और मोबाइल प्रीमियर लीग जैसे गेम्स में पैसा लगाना शुरू किया था। शुरुआती जीत ने उसे लत में डाल दिया लेकिन हारने पर उसने घर में ही चोरी शुरू कर दी। अब वह गंभीर मानसिक समस्याओं से जूझ रहा है, जिसने उसके परिवार को भी संकट में डाल दिया है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहाँ बच्चे लत के कारण चिड़चिड़े, गुप्त और आक्रामक हो गए हैं।
केंद्र सरकार ने इस समस्या पर कड़ा रुख अपनाते हुए दूरसंचार विभाग के माध्यम से 155 रियल-मनी गेम्स को बैन कर दिया है। NCPCR ने 25 से 30 अगस्त 2025 के बीच बिहार सहित देशभर में एक सर्वे किया, जिसमें पाया गया कि बैन के बाद भी 25 लाख बच्चों को गेमिंग की लत से छुटकारा नहीं मिला है और वे मानसिक तनाव का सामना कर रहे हैं। इन गेम्स में रियल-मनी गेम्स पोकर, रम्मी और फंतासी स्पोर्ट्स शामिल हैं जो बच्चों को आर्थिक और मानसिक रूप से नुकसान पहुंचा रहे हैं। अब ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025 के तहत इन गेम्स पर पूर्ण प्रतिबंध, सख्त उम्र सत्यापन और पेरेंटल कंट्रोल को अनिवार्य किया गया है।
विशेषज्ञों का इस बारे में कहना है कि गेमिंग की लत से बच्चों की एकाग्रता और पढ़ाई पर बुरा असर पड़ रहा है। NCPCR की रिपोर्ट के मुताबिक, इन बच्चों में चिंता, तनाव और अवसाद जैसे लक्षण देखे गए हैं। सामाजिक व्यवहार में कमी और परिवारों में तनाव भी बढ़ा है। कई बच्चे स्कूल में पिछड़ रहे हैं, क्योंकि गेमिंग के कारण उनकी नींद और समय प्रबंधन प्रभावित हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2019 में गेमिंग डिसऑर्डर को मानसिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में मान्यता दी थी और बिहार में यह समस्या अब चरम पर है।
ऐसे में NCPCR ने पेरेंट्स और शिक्षकों को सतर्क रहने की सलाह दी है जो निम्नलिखित हैं..
- बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखें और गेमिंग समय सीमित करें।
- पेरेंटल कंट्रोल और एंटीवायरस सॉफ्टवेयर का उपयोग करें।
- बच्चों को अजनबियों से ऑनलाइन बातचीत से बचने की सलाह दें।
- इन-गेम खरीदारी के लिए क्रेडिट/डेबिट कार्ड का उपयोग न करें और OTP आधारित भुगतान को प्राथमिकता दें।
आयोग ने स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य जाँच और काउंसलिंग सेवाओं को बढ़ाने की भी मांग की है, ताकि बच्चों को इस लत से बाहर निकाला जा सके। NCPCR ने कहा है कि केवल बैन से समस्या हल नहीं होगी। इसके लिए स्कूलों, परिवारों और सरकार को मिलकर काम करना होगा। बच्चों को जागरूक करने, वैकल्पिक मनोरंजन और खेलकूद को बढ़ावा देने और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाने की जरूरत है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह लत बिहार के लाखों बच्चों के भविष्य को और अंधकारमय कर सकती है।