Bihar News : बिहार में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट ने ग्रामीण कार्य विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट में ऐसे मामलों का खुलासा हुआ है, जहां बिना पर्याप्त आधारभूत तैयारी के करोड़ों रुपये खर्च कर पुलों का निर्माण करा दिया गया। हैरानी की बात यह है कि कई जगहों पर न तो संपर्क सड़क समय पर बनी और न ही परियोजना का उद्देश्य पूरा हो सका, जिससे सरकारी धन का बड़ा हिस्सा व्यर्थ चला गया।
सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार, पूर्वी चंपारण और अररिया जिले में दो पुलों के निर्माण पर करीब 3.30 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन दोनों परियोजनाएं आज तक आम लोगों के किसी काम की नहीं बन सकीं। वजह यह रही कि पुल बनने के बाद भी आवश्यक संपर्क मार्ग और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।
पूर्वी चंपारण में आठ साल से बेकार पड़ा पुल
रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्वी चंपारण जिले के बेतौना गांव की नोनिया टोली में एक पुल का निर्माण वर्ष 2018 में पूरा कर लिया गया था। योजना के तहत पुल के दोनों ओर संपर्क सड़क भी बनाई जानी थी, जिसके लिए जमीन अधिग्रहण आवश्यक था।
हालांकि, स्थानीय लोगों के विरोध के कारण जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। नतीजा यह हुआ कि पुल तो बन गया, लेकिन उससे जुड़ने वाली सड़क नहीं बन पाई। आठ साल गुजरने के बाद भी यह पुल उपयोग में नहीं आ सका और करोड़ों रुपये की सार्वजनिक राशि का लाभ लोगों तक नहीं पहुंच पाया।
अररिया में भी अधूरी रह गई परियोजना
इसी तरह अररिया जिले के जोकीहाट प्रखंड में थापकोल गांव से कढ़बना सड़क को जोड़ने के लिए पुल का निर्माण कराया गया। रिपोर्ट के अनुसार, परियोजना का लगभग 80 प्रतिशत काम पूरा हो चुका था और दोनों तरफ संपर्क पथ भी तैयार किया गया।
लेकिन मुख्य समस्या भूमि अधिग्रहण की रही। संपर्क मार्ग के लिए आवश्यक जमीन उपलब्ध नहीं हो सकी, जिसके चलते पुल का उपयोग शुरू नहीं हो पाया। निर्माण पूरा होने के कई वर्ष बाद भी यह परियोजना अधर में लटकी हुई है।
अधिकारियों की कार्यशैली पर उठे सवाल
सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में इन मामलों के लिए संबंधित अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि निर्माण कार्य शुरू करने से पहले आवश्यक जमीन की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की गई, जबकि सरकारी नियमों के अनुसार किसी भी सड़क या पुल परियोजना में पहले भूमि संबंधी सभी प्रक्रियाएं पूरी होनी चाहिए।
बताया गया कि पूर्वी चंपारण मामले में विभाग की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया, जबकि अररिया मामले में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात कही गई है।
तटबंध परियोजनाओं में भी भारी नुकसान
सीएजी रिपोर्ट में केवल पुल निर्माण ही नहीं, बल्कि बाढ़ सुरक्षा से जुड़ी परियोजनाओं में भी गंभीर अनियमितताओं का जिक्र किया गया है। बागमती-अधवारा, कमला-बलान और महानंदा नदी से संबंधित तटबंध परियोजनाओं में पर्याप्त जमीन उपलब्ध कराए बिना ही निर्माण कार्य के लिए टेंडर जारी कर दिए गए।
बाद में भूमि अधिग्रहण पूरा नहीं होने के कारण कई तटबंध अधूरे रह गए, जिससे लगभग 247.80 करोड़ रुपये का सरकारी निवेश प्रभावित हुआ। रिपोर्ट में कहा गया कि वर्षों बीत जाने के बावजूद इन परियोजनाओं का अपेक्षित लाभ लोगों को नहीं मिल सका।
नल-जल योजना पर भी सवाल
सीएजी ने राज्य की 'हर घर नल का जल' योजना की भी समीक्षा की है। जांच के दौरान कई ऐसे वार्ड सामने आए जहां लोगों को आर्सेनिक और फ्लोराइड युक्त पानी की आपूर्ति हो रही थी। रिपोर्ट में कहा गया कि इन इलाकों में जल शुद्धिकरण की समुचित व्यवस्था नहीं होने से कम से कम 1.17 लाख लोग दूषित पेयजल पीने को मजबूर हैं। वास्तविक संख्या इससे अधिक होने की आशंका भी जताई गई है।
सीएजी की यह रिपोर्ट सरकारी परियोजनाओं की योजना, निगरानी और क्रियान्वयन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि संबंधित विभाग इन अनियमितताओं पर क्या कार्रवाई करता है और भविष्य में ऐसी स्थितियों को रोकने के लिए कौन-कौन से सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं।





