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17 साल बाद फिर दौड़ेगी विकास की रफ्तार? सीमांचल की अटकी रेल परियोजना को मिली नई उम्मीद, 1852 करोड़ की मेगा योजना से बदलेगी तस्वीर

Railway Update: बिहार के सीमांचल क्षेत्र में लंबे समय से रुकी जलालगढ़–किशनगंज रेल लाइन परियोजना एक बार फिर चर्चा में है। इस प्रोजेक्ट के दोबारा सक्रिय होने के संकेतों से कटिहार, किशनगंज और पूर्णिया में विकास और कनेक्टिविटी को लेकर उम्मीदें...

17 साल बाद फिर दौड़ेगी विकास की रफ्तार? सीमांचल की अटकी रेल परियोजना को मिली नई उम्मीद, 1852 करोड़ की मेगा योजना से बदलेगी तस्वीर
Ramakant kumar
4 मिनट

Railway Update: बिहार के सीमांचल इलाके के लोगों के लिए एक बार फिर उम्मीद की किरण जगी है। लंबे समय से अधर में लटकी जलालगढ़–किशनगंज रेल लाइन परियोजना अब दोबारा चर्चा में है और संकेत मिल रहे हैं कि यह सपना अब हकीकत के करीब पहुंच सकता है। करीब 17 साल से फाइलों में धूल खा रही इस योजना के फिर से सक्रिय होने की खबर ने कटिहार, किशनगंज और पूर्णिया जैसे जिलों में नई उम्मीदें जगा दी हैं।


दरअसल, इस महत्वाकांक्षी रेल परियोजना की शुरुआत वर्ष 2008-09 में हुई थी। उस समय बड़े उत्साह के साथ इसका शिलान्यास किया गया था, लेकिन इसके बाद प्रशासनिक अड़चनों, तकनीकी कारणों और बजट संबंधी समस्याओं के चलते काम आगे नहीं बढ़ सका। नतीजा यह हुआ कि यह योजना धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चली गई और करीब डेढ़ दशक तक सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गई।


अब एक बार फिर इस परियोजना को गति देने की कोशिश तेज हो गई है। ताजा जानकारी के मुताबिक, इस रेल लाइन की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार कर रेलवे बोर्ड को भेज दी गई है। जैसे ही इसे अंतिम मंजूरी मिलती है, इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू होने का रास्ता साफ हो जाएगा।


हालांकि, इतने लंबे समय के बाद इस परियोजना की लागत में जबरदस्त इजाफा हो चुका है। शुरुआत में जहां इसका अनुमानित खर्च करीब 360 करोड़ रुपये था, वहीं अब यह बढ़कर लगभग 1852 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। प्रस्तावित रेल लाइन की कुल लंबाई करीब 51.6 किलोमीटर होगी, जो सीमांचल के कई अहम इलाकों को आपस में जोड़ेगी।


इस परियोजना का असर सिर्फ रेल कनेक्टिविटी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। कटिहार और किशनगंज के बीच यात्रा समय में कमी आएगी, जिससे रोजाना आने-जाने वाले लोगों को बड़ी राहत मिलेगी। इसके अलावा किसानों और छोटे व्यापारियों के लिए भी यह लाइन फायदेमंद साबित हो सकती है, क्योंकि वे अपने उत्पादों को बड़े बाजारों तक आसानी से पहुंचा सकेंगे।


रोजगार के नजरिए से भी यह परियोजना बेहद अहम मानी जा रही है। निर्माण कार्य के दौरान जहां स्थानीय लोगों को काम मिलेगा, वहीं इसके संचालन के बाद भी कई स्थायी रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।


पूर्णिया जिले के लिए तो यह योजना किसी ऐतिहासिक बदलाव से कम नहीं मानी जा रही। बताया जाता है कि वर्ष 1928 के बाद इस इलाके में कोई नई रेल लाइन नहीं बिछाई गई है। ऐसे में अगर यह प्रोजेक्ट जमीन पर उतरता है, तो लगभग 100 साल बाद इस क्षेत्र के रेल नक्शे में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।


प्रस्तावित योजना में आठ नए रेलवे स्टेशनों के निर्माण का भी प्रावधान है। इनमें खाताहाट, रौटा और महीनगांव जैसे इलाके शामिल हैं, जो अब तक रेल सुविधा से काफी हद तक वंचित रहे हैं। इन स्टेशनों के बनने से ग्रामीण क्षेत्रों की कनेक्टिविटी मजबूत होगी और लोगों का जीवन आसान बनेगा।


रणनीतिक दृष्टिकोण से भी यह रेल लाइन बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यह परियोजना भारत-बांग्लादेश सीमा के पास स्थित ‘चिकन नेक’ क्षेत्र के आसपास एक वैकल्पिक रेल मार्ग उपलब्ध कराएगी। किसी आपात स्थिति या मुख्य रेल मार्ग पर बाधा आने की स्थिति में यह लाइन बैकअप के तौर पर काम कर सकती है, जिससे सुरक्षा और परिवहन दोनों को मजबूती मिलेगी।


फिलहाल इस पूरी परियोजना की नजरें केंद्र सरकार और रेलवे बोर्ड की अंतिम मंजूरी पर टिकी हुई हैं। क्षेत्र के जनप्रतिनिधि और आम लोग लंबे समय से इस योजना को हरी झंडी मिलने का इंतजार कर रहे हैं। अगर सरकार की ओर से मंजूरी मिल जाती है, तो यह सिर्फ एक रेल लाइन नहीं बल्कि सीमांचल के विकास की नई पटरी साबित होगी।

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Ramakant kumar

FirstBihar न्यूज़ डेस्क

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