1st Bihar Published by: First Bihar Updated Mar 26, 2026, 5:14:50 PM
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Bihar News: बिहार के बहुचर्चित आरा सिविल कोर्ट बम ब्लास्ट मामले में बड़ा फैसला सामने आया है। पटना हाईकोर्ट ने इस मामले में सभी दोषियों को बरी कर दिया है। साथ ही मुख्य आरोपी लंबू शर्मा को निचली अदालत द्वारा दी गई फांसी की सजा को भी रद्द कर दिया गया है।
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद लंबू शर्मा और अखिलेश उपाध्याय को बम ब्लास्ट केस में राहत मिल गई है। हालांकि, दोनों आरोपियों को फिलहाल जेल में ही रहना होगा, क्योंकि जेल से फरार होने के एक अन्य मामले में उन्हें दोषी ठहराया गया है।
यह मामला 23 जनवरी 2015 का है, जब आरा सिविल कोर्ट परिसर में सुबह करीब 11:35 बजे जोरदार बम धमाका हुआ था। इस विस्फोट में एक महिला और एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। धमाके के बाद कोर्ट परिसर में अफरा-तफरी मच गई थी और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे थे।
जांच के दौरान यह बात सामने आई थी कि उत्तर प्रदेश की रहने वाली एक महिला नगीना देवी कोर्ट परिसर में बम लेकर आई थी। धमाके के दौरान उसकी भी मौत हो गई थी। वहीं, कोर्ट हाजत की सुरक्षा में तैनात सिपाही अमित कुमार ने भी इस घटना में अपनी जान गंवाई थी।
धमाके के तुरंत बाद कुख्यात अपराधी लंबू शर्मा और अखिलेश उपाध्याय पुलिस हिरासत से फरार हो गए थे, जिससे मामला और भी सनसनीखेज बन गया था। इस घटना के बाद पुलिस और जांच एजेंसियों ने बड़े स्तर पर कार्रवाई शुरू की थी।
निचली अदालत ने 20 अगस्त 2019 को इस मामले में फैसला सुनाते हुए लंबू शर्मा को मुख्य दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी, जबकि अखिलेश उपाध्याय को आजीवन कारावास की सजा दी गई थी। इसके अलावा अन्य छह आरोपियों को भी उम्रकैद और जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। हालांकि, उस समय भी 11 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था।
इस केस की जांच के दौरान कई बड़े नाम भी सामने आए थे। इनमें ब्रजेश सिंह, मुख्तार अंसारी और सुनील पांडेय जैसे नाम शामिल थे। हालांकि, बाद में पर्याप्त सबूत नहीं मिलने के कारण इन लोगों के खिलाफ आरोप सिद्ध नहीं हो पाए और इन्हें राहत मिल गई।
अब पटना हाईकोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलों और साक्ष्यों की समीक्षा के बाद यह फैसला सुनाया है कि आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त ठोस सबूत नहीं हैं, जिसके आधार पर उन्हें दोषी ठहराया जा सके। इसी कारण सभी दोषियों को बरी कर दिया गया और सजा को रद्द कर दिया गया।
इस फैसले के बाद एक बार फिर इस मामले को लेकर चर्चा तेज हो गई है। लंबे समय तक चले इस केस के बाद आए इस फैसले ने न्यायिक प्रक्रिया और जांच पर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं, वहीं पीड़ित परिवारों के लिए यह फैसला भावनात्मक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।