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Bhagavad Gita: इन चीजों पर कभी न करें घमंड, वरना बर्बाद हो जायेगी ज़िंदगी

भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश न केवल उस समय युद्ध भूमि में अर्जुन के लिए सहायक सिद्ध हुए, बल्कि आज भी मानव जीवन को प्रेरित करते हैं। गीता में श्रीकृष्ण ने घमंड को जीवन में उन्नति और शांति का सबसे बड़ा बाधक बताया है।

Bhagavad Gita

07-Feb-2025 08:53 PM

By First Bihar

Bhagavad Gita: भगवत गीता, जिसे भारतीय दर्शन का आधार माना जाता है, में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन के गूढ़ रहस्यों का ज्ञान दिया है। यह उपदेश न केवल अर्जुन के लिए युद्ध भूमि में सहायक सिद्ध हुए, बल्कि आज भी यह प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को प्रेरणा और दिशा प्रदान करते हैं। गीता के अनुसार, घमंड वह विनाशकारी गुण है, जो न केवल व्यक्ति के व्यक्तित्व को नष्ट करता है, बल्कि उसके सुख और शांति को भी छीन लेता है। गीता में श्रीकृष्ण ने घमंड से बचने और विनम्रता अपनाने का महत्व स्पष्ट रूप से बताया है। आइए, जानते हैं कि गीता के अनुसार किन चीजों पर घमंड नहीं करना चाहिए और क्यों।


1. ज्ञान पर घमंड:

गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, "ज्ञान हमेशा विनम्रता के साथ आता है।" यदि कोई व्यक्ति अपने ज्ञान पर घमंड करता है, तो वह अपने सीखने और आगे बढ़ने की संभावना को समाप्त कर देता है। घमंड व्यक्ति को अहंकारी बनाता है और उसे दूसरों के विचारों और अनुभवों को अपनाने से रोकता है। ज्ञान का सही अर्थ तब है, जब वह दूसरों की भलाई और समाज के विकास के लिए उपयोग में लाया जाए। जो लोग ज्ञान पर घमंड करते हैं, वे कभी भी अपने क्षेत्र में उन्नति नहीं कर सकते।


2. धन पर घमंड:

धन, जो जीवन को आरामदायक और सुखद बना सकता है, वह घमंड का कारण भी बन सकता है। गीता के अनुसार, "धन अस्थिर है और यह सदा किसी एक व्यक्ति के पास नहीं रहता।" आज यदि आपके पास अधिक धन है, तो यह कल किसी और के पास जा सकता है। इसलिए, अपने धन पर घमंड करना व्यर्थ है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि धन का उपयोग समाज और जरूरतमंदों की भलाई के लिए किया जाना चाहिए। धन पर घमंड करने वाले व्यक्ति कभी सुख और संतोष का अनुभव नहीं कर पाते।


3. सुंदरता पर घमंड:

श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि बाहरी सुंदरता केवल क्षणिक होती है। "सुंदरता वह गुण है, जो समय के साथ क्षीण हो जाता है।" व्यक्ति को अपनी बाहरी सुंदरता पर घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह किसी को भी केवल कुछ समय के लिए प्रभावित कर सकती है। गीता में आंतरिक सुंदरता और अच्छे गुणों को महत्व दिया गया है। बाहरी सुंदरता के स्थान पर यदि व्यक्ति अपने मन और विचारों को सुंदर बनाए, तो उसका प्रभाव स्थायी और गहरा होता है।


4. पद और प्रतिष्ठा पर घमंड:

गीता में यह भी बताया गया है कि व्यक्ति को अपनी शक्ति, पद, और प्रतिष्ठा पर भी घमंड नहीं करना चाहिए। ये सब चीजें अस्थायी हैं और समय के साथ बदल सकती हैं। घमंड व्यक्ति को अंधा बना देता है और वह दूसरों के प्रति असंवेदनशील हो जाता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि सच्चा नेता और महान व्यक्ति वही होता है, जो विनम्रता के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करे और दूसरों की सेवा करे।


5. कर्मफल का घमंड:

गीता का एक मुख्य संदेश यह है कि व्यक्ति को अपने कर्मों का घमंड नहीं करना चाहिए। श्रीकृष्ण कहते हैं, "कर्म करो, लेकिन फल की चिंता मत करो।" जब व्यक्ति अपने कर्मों के फल पर घमंड करता है, तो वह स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगता है और दूसरों को तुच्छ समझने लगता है। यह घमंड उसे आत्मिक विकास और सच्चे सुख से दूर कर देता है।


घमंड के दुष्परिणाम:

घमंड के कारण व्यक्ति न केवल अपने रिश्तों और सामाजिक प्रतिष्ठा को खो देता है, बल्कि यह उसकी मानसिक शांति और आत्मिक विकास को भी बाधित करता है। घमंड व्यक्ति को स्वार्थी और अहंकारी बनाता है, जिससे उसके जीवन में नकारात्मकता और तनाव का प्रवेश होता है।


घमंड से बचने का उपाय:

भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने घमंड से बचने के लिए निम्नलिखित उपाय बताए हैं:

विनम्रता का अभ्यास करें: हमेशा यह याद रखें कि जो कुछ भी आपके पास है, वह ईश्वर की कृपा और आपके अच्छे कर्मों का परिणाम है।

ध्यान और आत्मचिंतन: नियमित ध्यान और आत्मचिंतन से व्यक्ति अपने अहंकार को नियंत्रित कर सकता है।

सेवा भाव अपनाएं: दूसरों की सेवा करें और उनकी मदद करें। यह आपको अहंकार से बचाएगा।

सकारात्मक सोच रखें: जीवन में सकारात्मकता बनाए रखें और दूसरों की उपलब्धियों को सराहें।

गीता के उपदेशों का अनुसरण करें: गीता का अध्ययन करें और श्रीकृष्ण के बताए मार्ग का पालन करें।


भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि घमंड व्यक्ति के पतन का कारण बनता है। ज्ञान, धन, सुंदरता, पद, और कर्मफल पर घमंड करने से व्यक्ति अपनी सफलता और शांति को खो देता है। घमंड से बचने के लिए विनम्रता और सेवा का मार्ग अपनाना चाहिए। गीता के उपदेश आज के जीवन में भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने महाभारत के समय थे। इन उपदेशों को आत्मसात करके व्यक्ति सच्चे सुख, शांति और उन्नति का अनुभव कर सकता है।