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ज्ञानवापी को लेकर मस्जिद कमेटी को नहीं मिली अंतरिम राहत, HC में अब 12 फरवरी को होगी सुनवाई

 ज्ञानवापी को लेकर मस्जिद कमेटी को नहीं मिली अंतरिम राहत, HC में अब 12 फरवरी को होगी सुनवाई

07-Feb-2024 01:29 PM

By First Bihar

DESK : वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर में स्थित व्यास तहखाने में पूजा अर्चना शुरू किए जाने के आदेश के खिलाफ दाखिल याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। बुधवार को सबसे पहले हिंदू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन ने अपनी दलीलें पेश कीं। इस मामले में सुनवाई जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की सिंगल बेंच में  हुई। अब मामले की अगली सुनवाई 12 फरवरी को सुबह 10 बजे होगी। 


दरअसल,इलाहबाद हाईकोर्ट बुधवार को अंजुमन इंतजामिया मस्जिद समिति द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें वाराणसी अदालत के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें हिंदू भक्तों को ज्ञानवापी मस्जिद के तहखाने में प्रार्थना करने की अनुमति दी गई थी। हिंदू पक्ष के वकील हरि शंकर जैन सीपीसी की धारा 152 के बारे में बताया जिसमें किसी भी तरह की त्रुटि होने पर आदेश को बाद में सुधारा जाता है। 


जैन ने दलील दिया कि 1993 तक व्यास तहखाने में नियमित तौर पर पूजा अर्चना होती थी। 1993 के बाद साल में एक दिन पूजा की जाती रही है। इस दौरान  मुस्लिम पक्ष ने कभी भी पूजा पर आपत्ति नहीं की है। जस्टिस अग्रवाल ने हरिशंकर जैन से पूछा कि क्या अंतिम राहत सिर्फ एक अर्जी के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है ? इस पर जैन ने कहा है कि हमें कोई अधिकार नहीं दिया गया है। कोर्ट ने रिसीवर नियुक्त किया है और रिसीवर ने पूजा शुरू कराई है। 


उधर, जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने मुस्लिम पक्ष के वकील फरमान नकवी को CPC की धारा 152 का हवाला देते हुए कहा है कि इसके तहत किसी आदेश में त्रुटि को सुधारा जा सकता है।  जज ने कहा है कि 31 जनवरी को मुस्लिम पक्ष को भी सुना गया था। मुस्लिम पक्ष ने उस वक्त कोई आपत्ति नहीं जताई थी। फैसले के वक्त भी जिला जज को कोई आवेदन नहीं दिया गया था। 


नकवी ने फिर यह कहा कि 31 जनवरी के आदेश में अभी तक यह साफ नहीं है कि जिला जज ने अपने आदेश में सुधार किया था या किसी आवेदन पर आदेश पारित किया था या फिर उन्होंने सुओ मोटो लिया था।  अगर कोई आवेदन किया गया था तो वह अब तक सामने क्यों नहीं आया है। जज ने यह नहीं बताया था कि वह सीपीसी की धारा 152  के तहत मिली शक्तियों का उपयोग कर रहे हैं। नकवी के इन तर्कों पर जस्टिस अग्रवाल में कहा है कि ऐसा करना अप्रासंगिक हो सकता है।