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बर्थडे स्पेशल : मजदूरी करने वाले जीतन राम मांझी का सियासी सफर, क्लर्क से मुख्यमंत्री बनने की पूरी कहानी

बर्थडे स्पेशल : मजदूरी करने वाले जीतन राम मांझी का सियासी सफर, क्लर्क से मुख्यमंत्री बनने की पूरी कहानी

22-Sep-2019 11:35 AM

PATNA : 80 के दशक में अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत करने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की कहानी बड़ी अनोखी है. खेतिहर मजदूर से सीएम बनने तक के सफर में मांझी ने अपनी सियासत की नाव को ना जाने कितने मझधारों से निकाला. दलित चेहरे के तौर पर बिहार की राजनीति में अपनी जगह बनाने वाले जीतन राम मांझी के लिए आज सबसे खास दिन है. आज 22 सितंबर के दिन ही सन् 1944 में बिहार के गया जिले में उनका जन्म हुआ. 

20 मई 2014 जीतन राम मांझी, सीएम मांझी बन गए
जीतन राम मांझी, 20 मई 2014 बिहार की सियासत की इतिहास में यह नाम सुनहरे पन्नों में अंकित हो गया. इस दिन जीतन राम मांझी, दरअसल नीतीश कुमार ने सीएम पद से इस्‍तीफा देने के बाद जीतन राम मांझी को अपना उत्‍तराधिकारी नियुक्‍त किया. इस तरह मांझी, सीएम मांझी बने.  मांझी ने आज ही के दिन राजधानी पटना स्थित राजभवन में पद एवं गोपनीयता की शपथ ली. 

खेतिहर मजदूर मांझी कई सरकारों में मंत्री रहें
मांझी ने मजदूरी से जिंदगी के सफर की शुरुआत कर 1968 में डाक विभाग के क्लर्क बने और राजनीति के मैदान में उतरकर सूबे की कमान तक संभाली. जीतन राम मांझी आज बिहार की सियासत में एक जाना पहचाना नाम हैं. 80 के दशक में राजनीतिक सफर की शुरुआत करने वाले जीतन राम मांझी कांग्रेस, आरजेडी और जेडीयू की राज्य सरकारों में मंत्री का पद संभाल चुके हैं. 6 बार विधायक रहे मांझी पहली बार कांग्रेस की चंद्रशेखर सिंह सरकार में 1980 में मंत्री बने थे और उसके बाद बिंदेश्वरी दुबे की सरकार में मंत्री रहे. इसके बाद नीतीश सरकार में मंत्री बने.

ललक ने मांझी को काबिल बनाया
बिहार के गया जिला के खिजरसराय के महकार गांव के मुसहर जाति में जीतन राम मांझी का जन्म हुआ. उनके पिता रामजीत राम मांझी एक खेतिहर मजदूर थे. जीतन राम मांझी को भी बचपन में जमीन मालिक द्वारा खेतों में काम पर लगा दिया जाता था, लेकिन उनके मन में ललक ने उन्हें काबिल बनाया और उन्होंने तमाम परेशानियों से निकलकर सफलता के शिखर पर फतह हासिल की. 

1968 में क्लर्क बने मांझी ने 1980 में नौकरी छोड़कर कांग्रेस पार्टी का दामन थामा
1968 में डाक एवं तार विभाग में लिपिक की नौकरी मिली ,लेकिन 1980 में वे नौकरी छोड़कर कांग्रेस पार्टी के उस आंदोलन का हिस्सा बन गए, जिसमें 'आधी रोटी खाएंगे, इंदिरा को बुलाएंगे' में शामिल हो गए. इसके बाद 1980 में पहला चुनाव लड़ा और जीतकर मंत्री बने. इसके बाद मांझी को अपने राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढाव का सामना करना पड़ा था.

नीतीश कुमार के बेहद करीबी और भरोसेमंद रहे मांझी
इसके बाद राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री बने और फिर नीतीश का दामन थाम लिया और उनके करीबी बन गए. इसी का नतीजा है कि नीतीश ने जब सीएम के पद से इस्तीफा दिया देकर अपनी कुर्सी उन्हें सौंपी. हालांकि जब नीतीश ने बाद में उनसे इस्तीफा देने के लिए कहा तो वो चुनौती बनकर उनके सामने खड़े हो गए. इस तरीके से नीतीश कुमार के बेहद करीबी और भरोसेमंद माने जाने वाले मांझी सियासी संग्राम में विलेन मांझी भी बने. जिसके कारण उन्होंने पार्टी और पद से इस्तीफा दे दिया.

8 मई 2015 को हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा की स्थापना
जेडीयू से अलग होकर मांझी ने 8 मई 2015 को अपनी नई पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा की स्थापना की. मांझी अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. इलेक्शन कमीशन की आपत्ति के बाद हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा को बाद में हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) किया गया. 2015 बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए के साथ मिलकर मांझी की पार्टी ने 21 सीटों पर चुनाव लड़ा.

जीतन राम मांझी  

पिता : स्व. रामजीत राम मांझी (खेतिहर मजदूर)
जन्म : 22 सितंबर, 1944
पैतृक गांव- महकार (खिजरसराय, गया)
शक्षणिक योग्यता : स्नातक (प्रतिष्ठा)
पत्नी : श्रीमती शांति देवी
संतान : दो बेटे और पांच बेटियां

राजनैतिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक सेवाएं :
जाति में उपेक्षित (महादलित) समाज के लोगों के लिए विशेष कार्यक्रम चलना, महादलित आयोग के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका, महाविद्यालय का सृजन एवं विकास का कार्य करना, विश्वविद्यालय के अभिषद सदस्य के रूप में कार्य करना, मगही भाषा का प्रचार-प्रसार करना.

इन महत्वपूर्ण पदों पर रहे :

1983 से 1985 तक उपमंत्री (बिहार सरकार)
1985 से 1988 तक राज्यमंत्री
1998 से 2000 तक राज्यमंत्री
2008 से अब तक कैबिनेट मंत्री