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14-Nov-2025 01:10 PM
By First Bihar
Bihar Election Results 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों में महागठबंधन को कांग्रेस के साथ दोस्ती का भारी नुकसान उठाना पड़ा है। तेजस्वी यादव के लिए यह अनुभव वही झटका साबित हुआ, जो 2017 में यूपी में अखिलेश यादव को कांग्रेस के साथ गठबंधन के चलते हुआ था। बिहार में आरजेडी और कांग्रेस का गठबंधन 62 सीटों पर चुनाव लड़ने के बाद अब सिर्फ 6 सीटों पर ही कांग्रेस की बढ़त बनी है, जिससे इसका स्ट्राइक रेट 10 फीसदी से भी कम रह गया है। राजनीतिक विश्लेषक इसे स्पष्ट संकेत मान रहे हैं कि जब क्षेत्रीय दलों के मुकाबले कांग्रेस सामने आती है, तो भाजपा का प्रदर्शन हमेशा शानदार रहता है।
तेजस्वी यादव ने 2014 के बाद की सियासी सबक को नजरअंदाज किया और कांग्रेस को महागठबंधन में ज्यादा सीटें दे दीं, जिससे न सिर्फ कांग्रेस का खराब प्रदर्शन सामने आया बल्कि आरजेडी को भी भारी नुकसान हुआ। समन्वय की कमी, कमजोर प्रचार रणनीति और गठबंधन में असहमति ने महागठबंधन की स्थिति और खराब कर दी। वहीं, एनडीए की ओर से पीएम मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह और सहयोगी दलों ने लगातार प्रचार और रणनीतिक मंथन कर नतीजों में बढ़त बनाई।
ईंट बांधकर तैरना जितना कठिन है, उतना ही मुश्किल किसी दल के लिए कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ना भी साबित हुआ है। यह बात 2017 में उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की करारी हार से साफ़ हुई थी और अब वही स्थिति बिहार में देखने को मिल रही है। बिहार में आरजेडी के साथ कांग्रेस ने 62 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन मतगणना के शुरुआती रुझानों के अनुसार कांग्रेस केवल 6 सीटों पर आगे है। इसका मतलब है कि उसका स्ट्राइक रेट 10 प्रतिशत से भी कम है। 2017 में यूपी चुनाव में भी कांग्रेस ने 100 सीटों पर चुनाव लड़ा और केवल 7 सीटों पर जीत हासिल की थी। उस समय यह माना गया था कि कांग्रेस के साथ गठबंधन सपा के लिए भारी पड़ गया था।
तेजस्वी यादव ने इस सबक को नजरअंदाज कर बिहार में वही गलती दोहराई। 2014 के बाद से लगातार देखा गया है कि जब भी कांग्रेस सामने आती है तो भाजपा का प्रदर्शन और भी मजबूत होता है। इसके अलावा क्षेत्रीय दलों के मुकाबले कांग्रेस टिकाऊ नहीं साबित हो रही है। इसके परिणामस्वरूप आरजेडी को भी नुकसान हुआ, क्योंकि कांग्रेस को ज्यादा सीटें देने और समन्वय न होने के कारण महागठबंधन के वोट बंटने से प्रत्यक्ष रूप से आरजेडी की स्थिति कमजोर हुई।
वहीं, वामपंथी दलों ने अपनी मजबूती दिखाई है। महज 20 सीटों पर चुनाव लड़ने वाले भाकपा-माले ने 7 सीटों पर बढ़त बनाए रखी। इसका मतलब यह हुआ कि कांग्रेस की कमजोर स्थिति ने महागठबंधन की भी स्थिति को प्रभावित किया। इसके उलट एनडीए की रणनीति बेहद संगठित रही। केंद्रीय नेतृत्व, खासकर अमित शाह, लगातार पटना में कैंप कर सहयोगी दलों के साथ समन्वय बनाए रखे। तीन दिनों तक उनका कैंप नहीं रुका और मंथन व रणनीति पर ध्यान दिया गया। इसका प्रत्यक्ष लाभ एनडीए को मिला, जबकि महागठबंधन को करारा झटका लगा।
प्रचार में भी एनडीए ने महागठबंधन से आगे बढ़त बनाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी अभियान को लीड किया, अमित शाह ने 36 रैलियों में हिस्सा लिया, और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी 20 रैलियों में दिखाई दिए। भाजपा के लिए यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और अन्य वरिष्ठ नेता भी प्रचार में सक्रिय रहे। इसके अलावा, जेडीयू, लोजपा जैसे सहयोगी दलों के नेता भी प्रचार में एकजुट नजर आए। इसके विपरीत, महागठबंधन में न तो रणनीति पर सहमति बनी और न ही प्रचार में समन्वय नजर आया। इस तरह, बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में महागठबंधन के लिए कांग्रेस का कमजोर प्रदर्शन और समन्वय की कमी निर्णायक साबित हुई है, जबकि एनडीए की मजबूत प्रचार रणनीति और नेतृत्व की सक्रियता ने गठबंधन को भारी बढ़त दिलाई है।