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10-Nov-2025 03:44 PM
By First Bihar
Patna News: समय से पहले प्रसव की घटना को हल्के में लेने वालों के लिए चिंता की खबर है। पिछले कुछ वर्षों में समय से पहले प्रसव के मामले लगातार बढ़े हैं। पटना ऑब्स व गायनी सोसाइटी और शिशु रोग विशेषज्ञों की रिपोर्ट के अनुसार, शहर के पीएमसीएच, आइजीआइएमएस, एनएमसीएच, पटना एम्स और गर्दनीबाग अस्पताल के अलावा कुछ बड़े निजी अस्पतालों में सालाना लगभग 25 प्रतिशत प्रसूताओं के साथ ऐसा मामला सामने आता है।
बढ़ते मामलों और इसके स्वास्थ्य जोखिम को देखते हुए पीएमसीएच अस्पताल के शिशु एवं स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग ने 200 प्रसूताओं पर शोध करने का निर्णय लिया है। इस शोध में 100 महिलाएं जिनका समय से पहले प्रसव हुआ होगा और 100 महिलाएं जिनका प्रसव समय पर हुआ, शामिल होंगी। अस्पताल प्रशासन ने शोध की मंजूरी दे दी है। शोध में जूनियर डॉक्टरों के अलावा असिस्टेंट और एसोसिएट डॉक्टर भी शामिल रहेंगे।
पीएमसीएच के अधीक्षक डॉ. आईएस ठाकुर ने बताया कि बदलती लाइफस्टाइल और प्रेग्नेंसी को गंभीरता से न लेने की वजह से समय से पहले प्रसव के मामले बढ़े हैं। पीएमसीएच में मां या बच्चे की जान बचाने के लिए कई बार आठ महीने या सात महीने से पहले प्रसव करना पड़ता है। सात महीने में जन्म लेने वाले बच्चों को एनआईसीयू में रखना अनिवार्य होता है, और ऐसे बच्चों को स्वास्थ्य से जुड़ी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
पीएमसीएच शिशु रोग विभाग के अध्यक्ष, और एसोसिएट ने बताया कि गर्भधारण से पहले या दौरान यदि किसी महिला का एक या दो महीने पहले अचानक गर्भपात हुआ हो, तो ऐसी महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए। नियमित जांच और समय-समय पर डॉक्टर से परामर्श बेहद जरूरी है।
समय से पहले प्रसव से बचाव के उपाय
गर्भावस्था के दौरान पेट में दर्द होने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।
गर्भधारण के बीच कम से कम तीन साल का अंतर रखें।
एक बार समय से पहले प्रसव होने के बाद दूसरी बार गर्भधारण पर डॉक्टर से परामर्श लें।
बच्चेदानी या प्रजनन प्रणाली में कोई समस्या होने पर डॉक्टर की सलाह लें।
शरीर में किसी भी प्रकार के संक्रमण पर ध्यान दें।
दांतों में कीड़े या अन्य संक्रमण होने पर उपचार करवाएं।
यदि पहले भी प्रीटर्म डिलीवरी हुई हो, तो दूसरी बार भी समय से पहले प्रसव का जोखिम बढ़ जाता है।
शिशु और मां की सुरक्षा के लिए समय से पहले प्रसव की चेतावनी को गंभीरता से लेना बेहद आवश्यक है। विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता, नियमित जांच और सही देखभाल से इस जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।